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गुरुवार, अक्टूबर 08, 2026

दिमाग से जुड़ी विकलाँगताएँ

कुछ विकलांगताएँ इंसान के मस्तिष्क (दिमाग या ब्रेन) से जुड़ी होती हैं, जैसे कि सेरिब्रल पाल्सी (cerebral palsy), डाउन सिंड्रोम (Down syndrome), डिस्लेक्सिया (dyslexia), आउटिज़्म (autism), इत्यादी।

इन्हें स्नायु-तंत्र की विकलांगता (neurological disability) कहते हैं क्योंकि इनमें दिमाग और स्नायु (nerves) की कुछ कमी या कमजोरी या बीमारी होती है। इन्हें बाल विकास की विकालंगता (developmental disability) भी कहते हैं क्योंकि अक्सर यह बचपन में पता चलती हैं जब बच्चा ठीक से, शारीरिक या मानसिक रूप से विकसित नहीं होता है। लेकिन दिमाग से जुड़ी कुछ विकलांगताएँ बड़े उम्र के लोगों में भी हो सकती हैं, जैसे कि दुर्घटना में सिर पर चोट लगने से।

सरलता के लिए, इस आलेख में इन सभी विकलांगताओं के लिए मैं "विकास-विकालंगता" शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ।


 

यह आलेख विकास-विकालंगता वाले बच्चों-किशोरों और उनके परिवारों के लिए लिख रहा हूँ, ताकि वह अपने शारीरिक व कार्य-क्षमता के सशक्तिकरण की आवश्यकताओं (rehabilitation needs) को समझ सकें, ज़रूरत पड़ने पर उनके बारे में डॉक्टरों और थैरापिस्टों से बात कर सकें और स्वयं अपने बारे में निर्णय ले सकें।

आलेख लिखने के कारण

(1) विकास-विकालंगता सारा जीवन रहती है और उम्र के साथ व्यक्ति की ज़रूरतें बदलती रहती हैं। इसलिए आप को अक्सर डॉक्टरों या फिज़ियोथैरापिस्ट या अन्य थैरापिस्ट के पास जाना पड़ता है। इस आलेख से आप को अपने शरीर की कठिनाईयों की समझ आयेगी जिससे आप उन्हें अपनी बात बेहतर समझा सकते हैं।

(2) चूँकि विकास-विकालंगता सारा जीवन रहेगी तो आप हर बात के लिए डॉक्टर या थैरापिस्ट के पास नहीं जा सकते। इसलिए आप को अपनी देखभाल करना खुद सीखनी चाहिए ताकि आप घर पर अपने शरीर की क्षमता बनाये रखने के लिए नियमित रूप से वर्जिश, दिमागी एक्सरसाइज़, आदि कर सकें।

(3) आधुनिक तकनीकी (एप्प, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धि) की मदद से आप दुनिया भर के अपने जैसी कठिनाई के साथ जीने वाले अन्य लोगों से सम्पर्क कर सकते हैं, उनके अनुभवों से सीख सकते हैं, और उनके साथ अपने अनुभव बाँट सकते हैं। 

दिमाग के विभिन्न काम और उनसे जुड़ी विकलांगताएँ

इंसान का दिमाग अलग-अलग काम करता है, और विकास-विकलांगता की कठिनाईयाँ उनमें से किसी एक या कुछ कामों से जुड़ी होती हैं। विकास-विकलांगता को समझने के लिए, हम यह काम मुख्य रूप से तीन तरह के सोच सकते हैं - (1) माँसपेशियों को चलाना; (2)  सोचना, समझना, गिनना, पढ़ना, आदि; (3)  सामाजिक सम्बंध, भावनाएँ, प्रेम, स्नेह आदि जताना। आईये अब इन्हें एक-एक करके देखें।

1. माँसपेशियों को चलाना:

माँसपेशियों को चलाना जीवन के लिए ज़रूरी है क्योंकि उनकी सहायता से हम चलते-फिरते, खाते-पीते, पढ़ते-लिखते सब तरह के काम करते हैं। इस क्षमता को विकास-विकलांगता समझने के लिए तीन अलग-अलग श्रेणियों में बाँट कर जाँचा जा सकता है - 

(अ) उँगलियों से महीन काम जैसे कढ़ाई करने या सूई में धागा डालने या लिखने की क्षमता। (Fine movement coordination and strength) - कुछ विकास-विकलांगताओं में केवल महीन काम करने में कठिनाई होती है।

(ए) बड़ी माँसपेशियों से मेहनत या ताकत वाला काम करना जैसे चलना, सामान उठाना या तीर चलाना या क्रिकेट का बल्ला घुमाना। (Gross movement coordination & strength)

(इ) मुँह-गले की माँसपेशियों द्वारा खाना चबाने और निगलने की क्षमता। अगर बच्चा ठीक से खाना नहीं सकता या जल-दूध आदि नहीं पी सकता तो बच्चे का स्वास्थ्य कमजोर हो जायेगा।

कुछ विकलांगताओं में जैसे कि सेरिब्रल पाल्सी में शरीर के कुछ हिस्सों में यह क्षमता सही नहीं होती, जिससे वह अपनी माँस-पेशियों से सही तरीके से काम नहीं करवा पाते। 

आउटिज़्म में दिमाग में बाहर से सूचना लाने वाले स्नायु सैंसिटिव हो जाते हैं या अधिक काम करते हैं जिसकी वजह से वह किसी को छूना या अधिक पास आना, या शोर या तेज रोशनी पसंद नहीं करते। 

अगर आप को या परिवार में किसी को विकास-विकलांगता है तो इन तीनों तरह की माँस-पेशियों की क्षमता की अलग जाँच करनी चाहिये, क्योंकि इन सब का उपचार करने के लिए भिन्न तरीके हैं और हर व्यक्ति को उसकी ज़रूरत के अनुसार वर्जिश या अन्य उपचार की सलाह दे सकते हैं।

2. सोचना, समझना, गिनना, पढ़ना, आदि: 

दिमाग के अलग-अलग हिस्सों में सोचने-समझने की भी अलग-अलग क्षमताएँ होती हैं। दिमाग का कोई हिस्सा यादाश्त का काम करता है, कोई दूसरा हिस्सा सुनी हुई बात को समझने का काम करता है, एक अन्य हिस्सा पढ़ी हुई बात को समझने का काम करता है, और अन्य हिस्सा गिनती का काम करता है, या अन्य हिस्सा भाषा या तर्क की समझ करता है। इसलिए यह जानना ज़रूरी है कि किस तरह की सोचने-समझने की क्षमता में कमी या कमज़ोरी है। अगर दिमाग का एक बड़ा हिस्सा पूरा काम नहीं कर रहा तो उससे बहुत सी क्षमताओं पर असर पड़ सकता है, जबकि अगर दिमाग का केवल कोई विशेष हिस्सा ठीक से काम नहीं कर रहा तो उसमें केवल किसी एक या दो क्षमताओं पर असर पड़ सकता है। हर व्यक्ति भिन्न होता है, यह जानना कि वह किस बात में कमज़ोर है और किस बात में नॉरमल है, बहुत ज़रूरी है।

अक्सर बच्चे की एक तरह की समझ में कमी को, उसके पूरे दिमाग की कमज़ोरी समझ लेते हैं। 

डाउन सिंड्रोम में यादाश्त या सोचने-समझने की क्षमता में कमजोरी हो सकती है, डिमैंशिया में यादाश्त काम नहीं करती, डिस्लेक्सिया में पढ़ने और लिखने में कठिनाई होती है। जब स्कूल जाने वाले बच्चों में यह विकलांगता हो तो उसे "सीखने की विकलांगता" (learning disability) भी कहते हैं।

 कई तरह की आउटिज़्म में भी समझ की कठिनाई हो सकती है जैसे कि आउसबर्गर सिंड्रोम आउटिज़्म में लोग शब्दों के संकेतात्मक अर्थ समझने में कठिनाई महसूस करते हैं, जैसे कि कोई कहे "अरे कितना बढ़िया गाना गाया, मार डाला रे" में "मार डाला" को सचमुच मारना समझ सकते हैं।

आधुनिक शोध ने दिखाया है कि अगर दिमाग के एक हिस्से में कमी है तो उसका दूसरा हिस्सा उस कमी को कुछ हद तक पूरा कर सकता है, लेकिन उसके लिए पढ़ाने और समझाने के नये तरीके सोचने पड़ सकते हैं। 

3. सामाजिक सम्बंध, भावनाएँ, प्रेम, स्नेह आदि: 

हमारे मन की सारी भावनाएँ भी दिमाग में ही बनती हैं। अगर दिमाग का यह हिस्सा ठीक से काम न करे तो वह लोग अपनी भावनाओं जैसे प्रेम या स्नेह को ठीक से अभिव्यक्त नहीं कर पाते या उनका अपने व्यवहार पर नियंत्रण नहीं रहता।

इस तरह की कठिनाईयाँ अधिकतर आउटिज़्म में दिखती हैं, जिनकी वजह से वह लोग किसी के प्रति प्रेम नहीं जता पाते और मित्र नहीं बना पाते। इन कठिनाईयों की वजह से कई बार विकास-विकालंगता वाले कुछ लोग अपने गलत व्यवहार या अपनी इच्छाओं पर कंट्रोल नहीं कर पाते। 

अगर आप के परिवार में किसी बच्चे या किशोर को विकास-विकालंगता है

अगर आप के परिवार के बच्चे या किशोर को किसी तरह की विकास-विकालंगता है तो यह देखना चाहिये कि उस पर ऊपर बताई गई तीन तरह की क्षमताओं पर क्या असर है:

माँसपेशियों पर क्या असर है? ऊँगलियों के महीन काम पर क्या असर है? ताकत/मेहनत वाली बड़ी माँसपेशियों पर क्या असर है? खाना चबाने, निगलने पर क्या असर है?

सोचने-समझने की शक्ति पर क्या असर है? किस तरह की सोच-समझ पर कितना असर है जैसे कि गणित पर, तर्क समझने पर, सुनी बात पर, पड़ी बात पर, लिखने में, आदि। 

भावनाओं-व्यवहार पर क्या असर है?

केवल यह कहना काफी नहीं है कि विकास-विकालंगता है, दिमाग और शरीर के किस भाग पर उसका क्या असर है, जब तक वह पता नहीं चलेगा, उसकी ठीक से थैरेपी नहीं की जा सकती। अक्सर डॉक्टरों और थैरेपिस्ट को यह समझ नहीं होती या उनके पास समय नहीं होता कि वह हर बात की ठीक से जाँच करे और उसके लिए क्या करना चाहिये यह सलाह आप को धैर्य से समझायें। लेकिन अगर आप को यह समझ है तो आप अपने बच्चे के लिए सही उपचार खोज सकते हैं।

अगर बच्चे की कुछ माँसपेशियों में कोर्डिनेशन या संतुलन की कमी है तो उसकी थैरेपी भिन्न होगी, अगर उन माँसपेशियों में ताकत कम है तो उसकी थैरेपी अलग होगी। सोचिये कि अगर बच्चा लिखा हुआ पढ़ने में नहीं समझ पाता तो क्या उसके लिए सुन कर समझना या चित्रों से समझना अधिक आसान है? अगर उसे कहानी समझने में मुश्किल है तो क्या गणित में भी मुश्किल है? हर बात को अलग-अलग देखना और जाँचना चाहिये।

आधुनिक तकनीकी की सहायता

एक समय था जब हम सोचते थे कि अगर दिमाग के स्नायु-कोष (nerve cell) नष्ट हो गये हैं तो उसका कुछ नहीं हो सकता, वह नष्ट ही रहेंगे। जबकि आज की सोच है कि अगर दिमाग का एक हिस्सा काम नहीं कर रहा तो दिमाग के बाकी के हिस्से उस काम को कुछ हद तक करना सीख-सिखा सकते हैं।

अक्सर बच्चों-बड़ों के मन में लोगों की बातें सुन कर डर बैठ जाता है कि लोग हँसेंगे या बुरा-भला कहेंगे आदि। आप को मन में बैठे उन डरों की खुल कर बात करनी चाहिये और व्यक्ति को परिस्थिति से लड़ने की हिम्मत देनी चाहिये कि किसी के कहने-सोचने की परवाह मत करो। जब नये उपचार करते हैं तो उनका असर होने में समय लगता है, इसलिए हिम्मत बनाये रखना बहुत ज़रूरी है। अगर आप को बच्चा कुछ नहीं कर पा रहा तो उसकी आलोचना नहीं करनी चाहिये, लेकिन अगर वह थोड़ा सा भी सुधार ला रहा है तो उसकी सराहना अवश्य करनी चाहिये।

यह सोचना कि थैरेपी से सारी कठिनाईयाँ ठीक हो जायेंगी, गलत है। कई बार, जो कमी बन गई है, उसमें सब कोशिश के बाद कोई अंतर नहीं आयेगा। लेकिन हर बच्चे के साथ इतनी कोशिश की जानी चाहिये कि उसका जितना विकास हो सकता है, उसे उसका मौका मिले। कई बार लोग सोचते हैं कि अगर बच्चा ठीक से चल नहीं पा रहा या बोल नहीं पा रहा तो बिना कोई जाँच किये सोच लेते हैं कि इसका दिमाग भी कमज़ोर है, वह बच्चे को मौका और सहारा नहीं देते। 

आज दुनिया भर के विकलांग लोग अपने और अपने परिवार वालों के अनुभव व्हाटसएप्प, फेसबुक, यूट्यूब आदि से बाँटते हैं, और आप उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं। दुनिया की कोई भी भाषा हो, यूट्यूब पर आप उसके वीडियो के साथ अपनी भाषा में सबटाईटल के साथ देख सकते हैं। उदाहरण के लिए, अगर आप के बच्चे को सेरिब्रल पाल्सी है और उसे उँगलियों से महीन काम करने में कमजोरी है तो आप यूट्यूब पर इस विषय पर बहुत सारे वीडियो पायेंगे कि उँगलियों को महीन काम करने के लिए कौन सी एक्सरसाइज़ या थैरेपी कैसे करें।

बहुत से थैरेपिस्ट और विशेषज्ञ इस तरह के वीडियो बनाते हैं और बहुत से माता-पिता या विकलांग व्यक्ति अपने अनुभवों के वीडियो बनाते हैं,  जिनसे आप घर बैठे सीख सकते हैं। वीडियो का फायदा है कि आप घर बैठे अपनी भाषा में सीख सकते हो और अपनी कोशिशों को मोबाइल से इंटरनेट पर डाल कर लोगों से सलाह माँग सकते हो।

अंत में

करीब पैंतिस-चालिस साल पहले जब मैंने विकलांग बच्चों के साथ काम करना शुरु किया था, उस समय स्थिति बहुत खराब थी। गाँव और छोटे शहरों में रहने वाले लोगों के पास न सही अस्पताल या उपचार केन्द्र थे, न थैरेपिस्ट और विशेषज्ञ। तब हम ऐसे विषयों पर सरल किताबें बनाते थे, और विभिन्न देशों के गाँवों जा कर वहाँ स्वास्थ्य सेवकों, स्वयंसेवको और परिवार वालों को सिखाते थे कि विकलांग व्यक्ति या बच्चे के लिए क्या करें, कैसे करें। आज अस्पताल, थैरेपिस्ट आदि भी अधिक हैं पर उससे भी महत्वपूर्ण बात है कि लोगों को इस बारे में जानकारी मिलना अधिक आसान हो सकता है और आप एक-दूसरे से भी सीख सकते हो।

आधुनिक तकनीकी, इंटरनेट और कृत्रिम-बुद्धि आदि की मदद से आप खुद इसके बारे में अधिक जानकारी पा कर, अपने लिए और अपने परिवार के लिए बेहतर उपचार खोज सकते हैं। 

बहुत से देशों में विकलांग एसोसियशन बनी हैं जो इस काम में आप को सहारा दे सकती हैं। सरकारों ने भी इस दिशा में नये कानून और सेवाएँ शुरु की हैं। आप को अपने क्षेत्र की विकलांग एसोसिएशन से संबध बनाने चाहिये और अगर आप के क्षेत्र में नहीं हो तो आप को खुद ऐसी एसोसिएशन बनाने का सोचना चाहिये।

अगर इस बारे में आप को कोई प्रश्न या सुझाव हैं तो नीचे टिप्पणी लिखें, मैं उसका उत्तर देने की कोशिश अवश्य करूँगा।

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शुक्रवार, जून 28, 2024

आयुर्वेद और वैज्ञानिक शोध

आयुर्वेद में सदियों के अनुभवों से निर्मित भारतीय मानव-चिकित्सा का ज्ञान और समझ संचित है। इस ज्ञान में एक ओर से जड़ी-बूटियों से ले कर हर तरह के प्राकृतिक पदार्थों से जुड़ी जानकारी है। आयुर्वेद में मानव शरीर कैसे बना है, उसके अंगों, क्रियाओं और रोगोत्पत्ति व रोग-उपचार की प्राचीन सोच-समझ भी है। कुछ बातों में आयुर्वेद के विचार आज के वैज्ञानिक विचारों से भिन्न है, इसलिए आधुनिक अनुसंधानों से इस समझ के प्रमाण खोजने की आवश्यकता है।

अगर वैज्ञानिक अनुसंधान के बाद आयुर्वेद की कुछ बातों के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते तो उन्हें बदलना चाहिये या नहीं, और कैसे बदलना चाहिए, यह बहस व निर्णय आयुर्वेद के विशेषज्ञ ही ले सकते हैं।

पिछली कुछ सदियों में आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान की सोच तथा पद्धति विकसित हुई है जिसमें चिकित्सा के विषय पर वैज्ञानिक शोध व अनुसंधान कैसे किया जाना चाहिए की बात भी है। आज दुनिया में कोई भी चिकित्सा परम्परा हो, उसे इसी वैज्ञानिक शोध की कसौटी पर जाँचा जाता है।

यह आलेख आयुर्वेद और वैज्ञानिक अनुसंधान के विषय पर है।

International Meetingon Traditional Medcine in Asia, Bangalore, India, 2006

मैं, आयुर्वेद और शोध

मैं एलोपैथी का डॉक्टर हूँ और मुझे वैज्ञानिक शोध के क्षेत्र में अनुभव है। करीब बीस साल पहले, मैंने "एशिया की पाराम्परिक चिकित्सा पद्धितियों" के विषय पर बंगलौर में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सभा में हिस्सा लिया था, जिसमें मेरा आयुर्वेद से परिचय हुआ। उस समय मुझे बंगलौर में एक आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज जाने का मौका भी मिला था। इस आलेख की सभी तस्वीरें  २००६ की उसी सभा तथा वहाँ के आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज से हैं।

पिछले कुछ वर्षों में मुझे केरल में आयुर्वेदिक चिकित्सा करवाने का सकारात्मक अनुभव हुए थे। इसके साथ मुझे कुछ अन्य आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों में जाने और वहाँ के शिक्षकों से बातचीत का मौका भी मिला। उससे मुझे लगा कि बहुत से आयुर्वेदिक चिकित्सकों तथा प्रोफैसरों में चिकित्सा से जुड़े वैज्ञानिक शोध-पद्धितियों की समझ कुछ सीमित है। मेरे विचार में वैज्ञानिक शोध एक महत्वपूर्ण विषय है और आयुर्वेद के मेडिकल कॉलिजों को इस विषय में पढ़ने व सीखने की बहुत आवश्यकता है।

International Meetingon Traditional Medcine in Asia, Bangalore, India, 2006

जब हमें किसी उपचार से अच्छा अनुभव है, तो वैज्ञानिक शोध क्यों?

मेरे विचार में आयुर्वेदिक उपचारों पर वैज्ञानिक शोध करने के तीन प्रमुख कारण हैं -

(१) जब कोई दवा या उपचार रोगियों को राहत देते हैं, तब शोध से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि वे उपचार कितने प्रतिशत मरीजों को राहत देते हैं? वह राहत कितने समय तक रहती है? वे उपचार किस तरह से या क्यों सफल होते हैं? क्या उस उपचार के रोगियों पर कुछ अवांछनीय या नकारात्मक प्रभाव भी हैं? इस तरह के प्रश्नों के उत्तर खोजने से उन उपचारों को बेहतर किया जा सकता है।

(२) चिकित्सा-शोध ने दिखाया है कि जब रोगियों को डॉक्टर पर और उसके इलाज पर भरोसा होता है तो केवल यह विश्वास ही कुछ प्रतिशत मरीज़ों को ठीक कर देता है, इसे प्लेसेबो प्रभाव (placebo) कहते हैं। प्लेसबो प्रभाव को दवा या उपचार के प्रभाव से अलग समझना आवश्यक है। वैज्ञानिक शोध से हम यह समझ सकते हैं कि कितने लोग आयुर्वेद उपचार से इस तरह के विश्वास-प्रभाव की वजह से ठीक होते हैं, और कितने लोग सचमुच आयुर्वेद की दवाओं या उपचार से।

(३) एलोपैथी वाले कुछ चिकित्सक सोचते हैं कि आयुर्वेद सचमुच का ज्ञान नहीं है, यह जादू-टोना या अंधविश्वास है। आयुर्वेद पर वैज्ञानिक शोध से इस तरह के आरोपों से लड़ा जा सकता है।

International Meetingon Traditional Medcine in Asia, Bangalore, India, 2006

आयुर्वेद चिकित्सा का विकास कई सौ या हजारों वर्षों के अनुभव का नतीजा है, लेकिन विज्ञान कभी रुकता नहीं है, आगे बढ़ता रहता है, इसलिए आयुर्वेद को भविष्य में किस ओर जाना चाहिये, इसे समझने के लिए शोधकार्य चलता रहना चाहिये। आयुर्वेद में प्राचीन ज्ञान को बहुत महत्व दिया जाता है, लेकिन मेरे विचार में प्राचीन ज्ञान के साथ नया ज्ञान जोड़ना भी महत्वपूर्ण है। 

पश्चिमी वैज्ञानिक, चिकित्सक एवं शोधकर्ता स्वीकारते हैं कि आयुर्वेद जैसी प्राचीन परम्पराओं में वनस्पति जगत से जुड़ा गहरा ज्ञान है। जैसे कि किस पत्ते या जड़ आदि से किस रोग का उपचार हो सकता है। इसलिए वे लोग अक्सर इस जानकारी से उन पौधों से दवा खोजने और उसके रसायन पदार्थों को अलग करने के शोध करते हैं, लेकिन इन्हें आयुर्वेद-शोध नहीं कह सकते, क्योंकि वह लोग आयुर्वेद की सोच के अनुसार कुछ नहीं करना चाहते, बल्कि वह केवल अपनी पश्चिमी वैज्ञानिक सोच से नई दवाओं की खोज में लगे हैं।

वैज्ञानिक शोध कैसे करते हैं?

अनुसंधान करने का अर्थ है वैज्ञानिक मापदंडों के साथ निष्पक्ष प्रयोग या परीक्षण करना। इसे वैज्ञानिक शोध तभी माना जा सकता है अगर निम्नलिखित तीनों बातों को पूरा किया जाये - 

(१) शोध-प्रयोगों का लिखित प्रोटोकॉल होना चाहिए, जिसे अनुसंधान से पहले तैयार किया जाना चाहिए, और इसे एक वैज्ञानिक शोध कमेटी से मंजूरी मिलनी चाहिए। वैज्ञानिक शोध कमेटी के सदस्यों तथा शोध करने वाले के बीच में कोई व्यक्तिगत सम्बंध नहीं होना चाहिए, ताकि वह निष्पक्ष निर्णय लें। प्रोटोकॉल की मंजूरी के बाद, पूरे अनुसंधान को उस प्रोटोकॉल के अनुसार किया जाना चाहिए जिसमें उसके हर कदम को निष्पक्ष तरीके से देख कर जाँचा और मापा जाना चाहिये, और इसकी लिखित रिपोर्ट तैयार की जानी चाहिए।

(२) उस अनुसंधान के सभी सकारात्मक व नकारात्मक नतीजों को सांख्यकी (statistics) के मानदंडों से परखना चाहिए।

(३) उस अनुसंधान के हर चरण के प्रमाणों को सही तरीके से संजो कर रखना चाहिए, ताकि कोई भी वैज्ञानिक उस सारी प्रक्रिया और उसके हर कदम की स्वतंत्र जाँच कर सके।

इन तीनों बातों में से एक भी बात अधूरी हो, तो उस वैज्ञानिक शोध को विश्वास्नीय नहीं माना जा सकता। वैज्ञानिक शोधों की रिपोर्टों को ऐसी पत्रिकाओं में छापते हैं जिनमें छापने से पहले अन्य वैज्ञानिक आप के शोध को जाँच-परख सकते हैं। इन्हें पियर रिव्यू (Peer reviewed) यानि अन्य वैज्ञानिकों द्वारा जाँचे आलेखों की पत्रिकाएँ कहते हैं।

आयुर्वेद की वैज्ञानिक पत्रिकाएँ 

अगर हम आयुर्वेद से जुड़े विषयों पर शोध करना चाहते हैं तो सबसे पहला प्रश्न है कि क्या भारत में ऐसी पियर-रिव्यू वाली आयुर्वेद चिकित्सा की पत्रिकाएँ हैं और अगर हैं तो किस तरह की वैज्ञानिक क्षमता वाले लोग उसके साथ जुड़े हैं जो उसमें छपने वाले आलेखों की जाँच करते हैं?

इस विषय पर इंटरनेट पर खोज करने से मुझे निम्नलिखित आयुर्वेद की वैज्ञानिक पत्रिकाएँ मिलीं:

हिंदी में आयुर्वेदीक-अनुसंधान की भी शायद कुछ पत्रिकाएँ छपती हैं, लेकिन इनके पीडीएफ अंक इंटरनेट पर कठिनाई से मिलते हैं और इनके बारे में जानकारी सुलभ नहीं है। जैसे कि "आयुर्वेद एवं सिद्ध अनुसंधान पत्रिका", जिसकी वेबसाईट पुरानी शैली की है और जिसके कुछ आलेख मुझे अंग्रेजी में दिखे।

आयुर्वेद-अनुसंधान के विषय पर कुछ कार्यशाला आयोजित करने की भी छिटपुट खबरें मिलती हैं लेकिन जिस स्तर पर यह काम होना चाहिये, उससे मुझे यह बहुत कम लगता है।

अगर उपरोक्त जानकारी के अतिरिक्त अगर आयुर्वेद-शोध-अनुसंधान के विषय पर अन्य वैज्ञानिक पत्रिकाएँ छपती हैं हैं तो कृपया नीचे टिप्पणी करके उनकी सूचना दीजिये। इन विषयों पर अगर भारतीय भाषाओं में छपने वाली अन्य पत्रिकाएँ हैं तो उनकी जानकारी भी नीचे टिप्पणियों में दीजिये।

आयुर्वेदिक-शोधों में कमियाँ

मैंने उपरोक्त पत्रिकाओं में छपने वाले शोधों के कुछ आलेख पढ़े। मुझे उनमें कुछ कमियाँ दिखीं, जैसे कि:

  • अक्सर लेखक ऐसे शब्द या परिभाषाएँ उपयोग में लाते हैं जिनके अर्थ स्पष्ट नहीं हैं। जैसे कि एक आलेख में आयुर्वेद के मूलभूत मूल्यों की बात थी लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि वह मूलभूत मूल्य कौन से थे और कैसे निर्धारित किये गये थे? आयुर्वेद में वात, कफ, पित्त आदि शब्दों का भी प्रयोग होता है लेकिन उनके अर्थ भी मुझे स्पष्ट नहीं लगे। जब इस तरह के शब्द या परिभाषाएँ उपयोग करते हैं तो यह समझना आवश्यक है कि आयुर्वेद से जुड़े कितने प्रतिशत लोग उन मूल्यों या अर्थों से सहमत हैं? मुझे यह कमी आयुर्वेद से सम्बंधित बहुत से विचारों, शब्दों, अर्थों और मूल्यों के बारे में महसूस होती है। जब तक हर एक शब्द या विचार की सर्वसम्मत या बहुमत-स्वीकृत स्पष्ट परिभाषा नहीं होगी, तब तक उन पर वैज्ञानिक शोध करना कठिन ही नहीं, असम्भव होगा। आयुर्वेद-विशेषज्ञों को इस दिशा में सबसे पहले निर्णय लेने चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर विशेषज्ञों का डेल्फी सर्वे करके परिभाषाओं को स्पष्ट करना चाहिये।   
  • आयुर्वेद की नींव संस्कृत के ग्रंथों पर टिकी है, अक्सर भाषा बदलने से अंग्रेज़ी में उन संस्कृत शब्दों के सही अर्थ खोजना कठिन काम हो जाता है, इसलिए आयुर्वेद की संस्कृत या भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक पत्रिकाएँ उपलब्ध होना बहुत महत्वपूर्ण और आवश्यक है। बहुत खोजने पर इंटरनेट पर संस्कृत, हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में आयुर्वेदी-शोध की वैज्ञानिक पत्रिका नहीं मिली, यह मुझे बहुत गम्भीर कमी लगती है। मेरे विचार में असली शोध भारतीय भाषाओं में होना चाहिये, उसके बाद उनका अंग्रेज़ी में अनुवाद करना चाहिये ताकि शोध से जुड़े शब्दों को  उनकी सही परिभाषा में समझा जा सके।
  • मैंने ऊपर दी गई पत्रिकाओं में छपे कुछ आलेख देखे, जिन्हें पूर्ण रुप से वैज्ञानिक शोध नहीं कह सकते। जैसा मैंने ऊपर लिखा, चिकित्सा सम्बंधी शोध-प्रोटोकॉल कैसे तैयार किये जाते हैं, लगता है कि इसकी जानकारी कम है और अधिक लोगों तक पहुँचनी चाहिये। इस विषय पर आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलिजों द्वारा प्रोफैसरों, स्नातकों तथा विद्यार्थियों के लिए कार्यशालाओं का आयोजन होना चाहिये।

चीन में उनकी परम्परागत चिकित्सा (एकपंक्चर, आदि) पर बहुत शोध हुआ है। यह सब शोध और वैज्ञानिक शोध वे लोग चीनी भाषा में करते हैं और चीनी भाषा में वैज्ञानिक शोध की बहुत सी पत्रिकाएँ हैं। लेकिन यह बात नहीं है कि वह बाकी दुनिया में होने वाले शोधों से अनभिज्ञय हैं। वहाँ पर अंग्रेजी, फ्राँसिसी, स्पेनी आदि भाषाओ में छपने वाले महत्वपूर्ण शोधों के चीनी अनुवाद किये हुए सार या पूरे आलेख छापने वाली चीनी पत्रिकाएँ भी हैं, ताकि स्थानीय शोधकर्ताओं को खबर रहे कि दुनिया में क्या हो रहा है। आयुर्वेद से जुड़े शोध के लिए भारतीय भाषाओ में ऐसी पत्रिकाओं की आवश्यकता है क्योंकि इस चिकित्सा पद्धिति के मूल विचार संस्कृत में हैं और उन्हें अंग्रेजी में अनुवाद करने से उनकी सही परिभाषाएँ निश्चित करना कठिन हो जाता है।

नये कदम

भारत सरकार ने आयुर्वेदिक विज्ञान-शोध की राष्ट्रीय परिषद (Central Council for Research in Ayurvedic Sciences, CCRAS) स्थापित की है। इनकी सन २००० की अनुसंधान पोलिसी भी है। इनकी सूची भी है कि किस राज्य में कौन से शोध किये जा रहे हैं (लेकिन इसमें यह नहीं लिखा कि यह सूची किस साल की है)। इनका एक अंग्रेजी में शोध-पोर्टल है जिसे बहुत जटिल बनाया गया है और जिसमें कोई आलेख खोजना मुझे आसान नहीं लगा, शायद यह शोध विशेषज्ञों के लिए बना है।

विश्व स्वास्थ्य संस्थान ने भी, भारत सरकार के सहयोग से एक अंतर्राष्ट्रीय पारम्परिक चिकित्सा केन्द्र (Global Traditional Medicine Centre - GTMC) की जामनगर-गुजरात (भारत) में स्थापना की है।

आशा करता हूँ कि इन नये संस्थाओं से आने वाले समय में आयुर्वेद से जुड़े शोध करना पहले से अधिक आसान होगा। 

अंत में

आयुर्वेद की मेरी समझ सतही है। लेकिन मेरे विचार में आयुर्वेद के विषयों पर वैज्ञानिक शोध और उस शोध के परिणामों को वैज्ञानिक पत्रिकाओं में लोगों को लोगों को उपलब्ध कराने में बहुत सा काम बाकी है।
 
अगर आप आयुर्वेद से जुड़े किसी क्षेत्र में अनुसंधान करने की सोच रहे हैं और आप के मन में उसके प्रोटोकॉल से सम्बंधित कुछ प्रश्न हैं तो मुझसे सम्पर्क करें, मैं आयुर्वेद के बारे में नहीं जानता लेकिन चिकित्सा के शोध-प्रोटोकॉल कैसे बनाये इसमें मदद कर सकता हूँ।  आप मेरे शोध-आलेखों की लिन्क इस ब्लाग के दायें हाशिये पर खोज सकते हैं, मेरे शोध क्षेत्र कुष्ठ रोग और विकलांगता से जुड़े हैं।
 
International Meetingon Traditional Medcine in Asia, Bangalore, India, 2006
 
टिप्पणी: इस आलेख के साथ लगी सभी तस्वीरें २००६ की परम्परागत चिकित्सा की बंगलौर कौन्फ्रैंस से हैं।
 
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रविवार, अगस्त 21, 2022

अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा रिपोर्ट का घोटाला

गेट फाऊँन्डेशन, युनेस्को, युनिसेफ़, युएसएड जैसी संस्थाओं के नाम दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। युनेस्को और युनिसेफ़ तो संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्थाएँ हैं। ऐसी संस्थाएँ जब कोई रिपोर्ट निकालती हैं तो हम उन पर तुरंत विश्वास कर लेते हैं।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इन अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के प्रति कुछ संदेह जागे हैं। जैसे कि २०१९ के अंत में चीन में वुहान से कोविड की बीमारी निकली और दुनिया भर में फ़ैली तो विश्व स्वास्थ्य संस्थान ने जब इस महामारी की समय पर चेतावनी नहीं दी तो बहुत से लोगों ने इस संस्था की ओर उंगलियाँ उठायीं कि उन्होंने चीनी सरकार के रुष्ट होने के भय से दुनिया के देशों को समय पर महत्वपूर्ण जानकारी नहीं दी। ऐसी ही कुछ बात शिक्षा से जुड़ी एक नयी अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्ट के बारे में भी उठायी गयी है जिसका विषय है प्राथमिक विद्यालयों के छात्रों में पढ़ायी की क्षमता। इस रिपोर्ट पर आरोप है कि उन्होंने इस रिपोर्ट में जान बूझ कर गलत आंकणों का प्रयोग किया है। यह आलेख इस रिपोर्ट और उस पर लगे आरोपों के बारे में है।


दो तरह की रिपोर्टें

कर्मा कोलोनियलिस्म की वेबसाईट पर साशा एलिसन ने प्रसिद्ध अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा छापी २०२२ की एक नयी रिपोर्ट "सीखने की गरीबी" (Global Learning Poverty Report, 2022) के बारे में लिखा है, जिसमें विभिन्न देशों में शिक्षा की स्थिति के बारे में चर्चा है। इन देशों में भारत भी है। इस रिपोर्ट को छापने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ हैं वर्ल्ड बैंक, युनिसेफ, युनेस्को, बिल गेटस फाऊन्डेशन तथा कुछ विकसित देशों की सहायता एजेन्सियाँ।

एलिसन ने अपने आलेख में दिखाया है कि यह संस्थाएँ दो तरह की रिपोर्टें छापती हैं। जब यह दिखाना हो कि इन संस्थाओं के कार्यक्रमों से लाभ पाने बच्चों का शिक्षा स्तर कितना सुधरा है तो यह सकारात्मक जानकारी देती हैं। जब जनता से और सरकारों से अपने कार्यक्रमों के लिए पैसे माँगने का समय आता है तो अचानक उन्हीं बच्चों के शिक्षा स्तर गिर जाते हैं। इसके लिए यह रिपोर्टें आंकणों को अपनी मनमर्ज़ी से गलत ढंग से बढ़ा-चढ़ा कर दिखाती हैं।

जैसे कि २०१५ में जब संयुक्त राष्ट्र के लिए मिल्लेनियम डेवेलेपमैंट गोलस् (सहस्राब्दी विकास लक्ष्य) में मिली सफलताओं की रिपोर्ट तैयार की गयी तो युनेस्को की रिपोर्ट में बच्चों की शिक्षा की रिपोर्ट बहुत सकरात्मक थी, क्योंकि उसमें दिखाना था कि सन् २००० से २०१५ तक के किये खर्चे से चलाये जाने वाले कार्यक्रमों से दुनिया में बच्चों को कितना लाभ हुआ।

एक साल बाद संयुक्त राष्ट्र ने सस्टेनेबल डेवलेपमैंट गोलस् के तहत २०३० तक के नये लक्ष्य निर्धारित किये, तो सभी संस्थाएँ अपने कार्यक्रमों के लिए पैसे जमा करने के लिए अफ्रीका और एशिया के विकासशील देशों की शिक्षा स्थिति के बारे में नकारात्मक रिपोर्ट दिखाने लगीं।

२०२२ की अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा रिपोर्ट

एलिसन स्वयं लाओस में शिक्षा के क्षेत्र में काम करते थे और जब उन्होंने "सीखने की गरीबी" रिपोर्ट में पढ़ा कि लाओस में स्कूल जाने वाले पाँचवीं कक्षा के ९७.६ प्रतिशत बच्चे ठीक से नहीं पढ़ सकते तो उन्हें शक हुआ कि यह गलत आंकणे लिये गये हैं। उन्होंने इस रिपोर्ट में शिक्षा के बारे में छपे आंकणों का विशलेषण किया है और दिखाया है कि इसमें अफ्रीका और एशिया के विकासशील देशों के बारें में जानबूझ कर गलत आंकणे लिए गये हैं। उदाहरण के लिए इस रिपोर्ट के हिसाब से एशिया के छः देशों में केवल ३७ प्रतिशत बच्चे सरल भाषा की किताब को पढ़ सकते हैं जबकि इसका सही आंकणा ८४ प्रतिशत होना चाहिये था।

रिपोर्ट के लिए गलत जानकारी देने के अतिरिक्त इस रिपोर्ट में आंकणों की एक अन्य समस्या है, कि अगर किसी देश से आंकणे न मिलें तो उसके आसपास के देशों के आंकणे ले कर उन सब देशों के औसत आंकणे बना लीजिये। जैसे कि रिपोर्ट में नाईजीरिया के आंकणे नहीं थे। जनसंख्या की दृष्टि से नाईजीरिया अफ्रीका का सबसे बड़ा देश है। इसलिए एलिसन कहते हैं कि आसपास के उससे दस गुना छोटे देशों की स्थिति के आधार पर इतने बड़े देश की स्थिति के बारे में "औसत आंकणे" दिखाना गलत है। लेकिन इस औसत आंकणों की बात को रिपोर्ट में स्पष्ट रूप में नहीं बताया गया है।

भारत में शिक्षा की स्थिति

भारत में बच्चों की शिक्षा से पायी समझ को मापने के लिए "आसेर" (Annual State of Education - ASER) के टेस्ट किये जाते हैं, इसमें देखा जाता कि पाँचवीं कक्षा के कितने प्रतिशत बच्चे दूसरी कक्षा की किताबों को पढ़ सकते हैं। भारत की स्वयंसेवी संस्था "प्रथम" इसको जाँचने के लिए देश के विभिन्न राज्यों में समय-समय पर सर्वे करती है। इसका आखिरी "आसेर" सर्वे २०१८ में किया गया, जिसकी रिपोर्ट २०१९ में निकली थी।

इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में राष्ट्रीय स्तर पर करीब ४५ प्रतिशत पाँचवीं कक्षा के बच्चे दूसरी कक्षा की किताबों को आसानी से पढ़ सकते थे, जबकि बाकी के ५५ प्रतिशत बच्चों को वह किताबें पढ़ने में कठिनाई थी। विभिन्न राज्यों के स्थिति में बहुत अंतर था - एक ओर हिमाचल प्रदेश में ७५ प्रतिशत, केरल में ७३ प्रतिशत बच्चे पढ़ाई में सक्षम थे जबकि, दूसरी ओर झारखँड में केवल २९ प्रतिशत और असम में ३३ प्रतिशत बच्चे सक्षम थे। इस रिपोर्ट के अनुसार पिछले दस वर्षों में बच्चों की पढ़ने की सक्षमता बेहतर होने के बजाय कुछ कमज़ोर हुई है, जो चिंता की बात है। शिक्षा व्यवस्था राज्य सरकारों के आधीन है, इसलिए जिन राज्यों में स्थिति कमज़ोर है उन्हें इसे सुधारने में प्रयत्न करना चाहिये और "प्रथम" की रिपोर्ट पर ध्यान देना चाहिये।

२०२२ की "पढ़ाई की गरीबी" रिपोर्ट में भारत के बारे में कहा गया है कि ५६ प्रतिशत पाँचवीं के बच्चे दूसरी कक्षा की किताबों को पढ़ने में असमर्थ थे,जोकि ऊपर दी गयी "प्रथम" की सर्वे की रिपोर्ट के आंकणे से मिलता है।

अंत में

जब कोई अंतर्राष्टीय रिपोर्ट, विषेशकर जब उससे गेट फाऊँन्डेशन, युनेस्को, युनिसेफ़ युएसएड जैसे बड़े और प्रतिष्ठित नाम जुड़े हों तो हम उस पर तुरंत भरोसा कर लेता हैं क्योंकि हम सोचते हैं कि इतनी बड़ी संस्थाएँ अवश्य अच्छा काम ही करेंगी।

साशा एलिसन का आलेख दिखाता है कि कभी कभी ऊँची दुकान, फ़ीका पकवान वाली बात हो सकती है। यानि बड़े नामों पर भरोसा नहीं कर सकते और उनकी रिपोर्टों को आलोचनात्मक दृष्टि से परखना चाहिये।

अक्सर ऐसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में भारतीय विशेषज्ञ जुड़े होते हैं और भारत का राष्ट्रीय सर्वे संस्थान विभिन्न विषयों पर सर्वे करता रहता हैं इसलिए उनमें भारत सम्बंधी गलत जानकारी या आंकणें नहीं मिलने चाहिये, लेकिन फ़िर भी सावधानी बरतना आवश्यक है।


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