गुरुवार, जुलाई 09, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 12

अब तक की कहानी: ताकानोरी ने जामुन बाबा को खोज लिया था, लेकिन उससे बचने के लिए बाबा ने जीवित समाधी ले ली थी। गँगटोक से त्रिनेत्र अपने साथ पाँच बाल-तिरंगा यौद्धाओ को साथ ले कर बाबा की रक्षा के लिए मजूली के वृद्धाश्रम में जाने के लिए निकल चुका है, उनके साथ आभा भी आ रही है। इधर ताकानोरी ने बाबा के वृद्धाश्रम का पता लगा लिया और वहाँ पर अपने साथी सोमचाई और 3 गुँडों के साथ वहाँ पहुँच गया है। ताकानोरी को जामुन बाबा की गुप्त शक्ति वाली हरित तारा की मर्ति खोजनी है। इससे आगे पढ़िये ...

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अध्याय 12

मजूली द्वीप, असम, 3 मार्च 2026

आश्रम के दफ्तर का द्वार खुला था लेकिन भीतर कोई नहीं था, सब लोग बाहर मैदान में थे।

जगदीश बाबू वहाँ पास में खड़े थे, उन्होंने ताकानोरी और उसके आदमियों को दफ्तर में जाते देखा तो वह उनके पीछे-पीछे आये, बोले,

“अगर आप को जामुन बाबा की समाधी देखनी है तो बाहर कतार में खड़ा होना पड़ेगा, यहाँ वृद्धाश्रम में आप को कुछ नहीं मिलेगा।"

ओरी ने अंग्रेज़ी में पूछा, “यह बाबा आश्रम में कहाँ रहते थे? हम उनका कमरा देखना चाहते हैं।"

जगदीश बाबू के माथे पर बल पड़ गये, बोले, “बाहर के लोगों को वहाँ जाने की अनुमति नहीं है।"

बटेर ने आगे बढ़ कर जगदीश बाबू के कँधे पर ज़ोर से हाथ मारा, बोला, “बुढ़ऊ, जिन्दा रहना है या नहीं? साहिब जो पूछें उसका सीधा जवाब दो, वरना ऐसा झापड़ दूँगा कि तुम्हारी नकली बतीसी मुँह से निकल कर तुम्हारे हाथ में आ जायेगी।"

शोर सुन कर बाहर से दो अन्य वृद्ध वहाँ आये, एक पुरुष और एक स्त्री। उन्होंने बटेर को जगदीश बाबू को मारते देखा तो दरवाज़े से चिल्लाये, “कौन हो तुम? क्या कर रहे हो? जगदीश बाबू को हाथ मत लगाओ।"

ओरी ने बटेर को इशारा किया तो वह पीछे हट गया, उसने दोबारा पूछा, “उनका कमरा कौन सा है?”

जगदीश बाबू के उसे घूर कर देखा, कुछ उत्तर नहीं दिया। ताकानोरी के इशारे पर बटेर ने जगदीश बाबू को चटाक से एक थप्पड़ मारा, वह लड़खड़ा कर वहीं गिर पड़े और उनकी नाक से खून बहने लगा, उनकी ऐनक दूसरी ओर गिरी, पर सौभाग्यवश टूटी नहीं।

ताकानोरी के इशारे पर लक्की और मटरू दरवाज़े पर खड़े लोगों के पास गये, बोले, “बाहर से आश्रम के सभी लोगों को यहाँ बुलाओ, हमें तुम सबसे बात करनी है।"

बटेर ने जगदीश बाबू की गर्दन से उनका कुर्ता पकड़ कर उठाया और एक कुर्सी पास खींच कर उन्हें बैठा दिया, बोला, “बुढ़ऊ, अगर आज तुम्हें अपने जामुन बाबा से मिलने स्वर्ग लोक जाने की जल्दी नहीं हो, तो साहब जो पूछें उसका सीधा और तुरंत जवाब चाहिये। ज़्यादा चालाकी दिखाओगे तो साहिब मुँडी काट कर हाथ में थमा देंगे।"

जगदीश बाबू फ़िर भी कुछ नहीं बोले और उसे घूरते रहे। ताकानोरी ने लम्बी साँस ली और वह भी एक कुर्सी पर बैठ गया।

केवल सोमचाई नहीं बैठा, उसने आगे बढ़ कर ज़मीन से जगदीश बाबू की ऐनक उठा कर उन्हें दी, फ़िर वहीं पीछे जा कर खड़ा हो गया। वह कम्प्यूटर का काम करता है, उसने कभी मारा-मारी नहीं की है और जगदीश बाबू की नाक से बहता खून देख कर उसका जी घबराने लगा था। उन्हें एक बूढ़े आदमी को इस तरह से मारते देख कर भी उसे धक्का लगा था।

धीरे-धीरे आश्रम के सभी वृद्ध उस कक्ष में आ कर इक्ट्ठे हो गये। बटेर ने पूछा, “यहाँ कितने लोग रहते हैं?”

एक वृद्धा बोली, “सतरह औरतें और सात आदमी, हम कुल चौबीस लोग और हमारे संचालक, जगदीश बाबू, पच्चीस।"

बटेर ने कमरे में एकत्रित लोगों को गिना, बोला, “फ़िर यहाँ पर सत्ताईस लोग कैसे हैं?”

एक बूढ़ा आदमी बोला, “मुझसे मिलने मेरी बेटी और नाती बाहर से आये हैं", उसने एक युवती और एक किशोर की ओर इशारा किया।

उनका नाती चौदह-पंद्रह साल का लगता था। बटेर ने इशारा करके उसे आगे बुलाया और उसके कँधे पर हाथ रख लिया, बोला, “हमारे पास टाईम कम है, इसलिए साहिब जो पूछेंगे, उसका ठीक से जवाब दो। अगर सही जवाब नहीं मिलेगा तो मैं इस लड़के को मार डालूँगा, समझे?”

कक्ष में सन्नाटा छा गया। उस लड़के के नाना बोले, “मेरे बच्चे को जाने दो। यह लोग यहाँ नहीं रहते, इन्हें कुछ नहीं मालूम, मारना है तो मुझे मारो।"

बटेर ने कुछ उत्तर नहीं दिया, बस अपना हाथ कँधे से उठा कर उस लड़के को सिर के बालों से पकड़ लिया और दूसरे हाथ में खुला हुआ रामपुरिया चाकू निकाल कर, उसे उसके गले के साथ सटा दिया।

ओरी मुस्कराया और बोला, “यह बाबा कहाँ रहते थे? उनका कमरा किधर है?”

इस बार जगदीश बाबू ने काँपती आवाज़ में उत्तर दिया, बोले, “आश्रम के गेट के बाहर, बायीं ओर पेड़ों के बीच में उनका घर है।"

ओरी के इशारे पर लक्की और मटरू, बाबा का घर खोजने गये।

ताकानोरी बोला, “समाधी के पास जो मन्दिर है, वहाँ पर तारा माँ की सफेद और हरी, दो रंगों की मूर्तियाँ लगीं हैं। मैं वैसी ही एक विशेष हरी मूर्ति खोज रहा हूँ। क्या बाबा के पास ऐसी कोई विशेष मूर्ति थी?”

“माँ तारा की मूर्तियाँ?”, एक वृद्धा बोली, “वे तो यहाँ आश्रम में हर जगह मिलेंगीं। उनमें विशे़ष कौन सी है, यह तो भगवान जानें। बाबा ने जब समाधी ली, तब भी उनके हाथ में एक कटोरा था जिसमें हरे रंग की माँ तारा की मूर्ति थी।"

जगदीश बाबू बोले, “जामुन बाबा को माँ तारा की मूर्तियों से बहुत प्रेम था, यहाँ पर वैसी बहुत सी मूर्तियाँ मिलेंगीं। लेकिन उनमें कोई विशेष मूर्ति हमें नहीं मालूम।"

ओरी ने आँखें बन्द कर लीं और अपनी अन्वेषण-किरण से धीरे-धीरे सारे वृद्धाश्रम का निरीक्षण किया लेकिन उसे वहाँ शक्ति लहर का स्पंदन महसूस नहीं हुआ। इसका मतलब है कि बाबा ने वह मूर्ति वृद्धाश्रम के भीतर नहीं है, शायद उसे बाहर कहीं छिपाया गया है या वह धरती के नीचे गहरी दबी हुई है, जहाँ उसकी अन्वेषण-किरण नहीं पहुँच रही। शायद बाबा ने उस मूर्ति के साथ समाधी ली है और अगर ऐसा है तो उन्हें उनकी समाधी को खोदना पड़ेगा?

उसने पूछा, “बाबा ने समाधी लेने से पहले क्या किसी के लिए कुछ निर्देश छोड़े?”

“कैसे निर्देश?” जगदीश बाबू को उसका प्रश्न समझ नहीं आया।

"किसी के लिए कोई कागज़, चिट्ठी या संदेश?”

जब जगदीश बाबू ने उत्तर नहीं दिया तो ओरी के इशारे पर बटेर ने फ़िर से चाकू निकाल कर लड़के के गले से सटा दिया, बोला, “बुढ़ऊ, सोच लो, जवाब नहीं दोगे तो इसकी गर्दन काट दूँगा, फ़िर मत रोना।"

जगदीश बाबू को झुरझुरी सी आयी, घबरा कर बोले, “एक चिट्ठी दी है, त्रिनेत्र के नाम है।"

“त्रिनेत्र कौन है?”

"उनका शिष्य और उत्तराधिकारी, वह यहाँ नहीं रहता।"

“चिट्ठी दिखाओ।"

जगदीश बाबू लड़खड़ाते हुए अपनी कुर्सी से उठे, बोले, “मेरे दफ्तर में रखी है, मैं ले कर आता हूँ।"

ताकानोरी ने सोमचाई को उनके साथ जाने का इशारा किया। जगदीश बाबू ने दालान पार किया और पीछे अपने दफ्तर के कमरे में गये। तब तक उनकी नाक से खून बहना बंद हो गया था पर उसके दाग उनके कुर्ते पर जमे हुए थे।

सोमचाई बोला, “ताकानोरी एक जापानी याकूज़ा है। यह लोग बहुत क्रूर होते हैं। इसलिए उसकी बात मानने में ही आप सब की भलाई है, अगर वह गुस्सा हो गया, तो अपनी कताना-तलवार से सबके सिर काट देगा।"

जगदीश बाबू ने उसकी बात का उत्तर नहीं दिया, अपनी मेज़ पर रखी जामुन बाबा की चिट्ठी को उठा कर सोमचाई को दिया और दोनों लौट आये। कमरे में घुसे तो देखा कि लक्की और मटरू भी बाबा के घर से कुछ सामान ले कर आ गये हैं।

उस सामान को मेज़ पर रखते हुए लक्की बोला, “वह छोटा सा घर है, बस दो कमरे है। वहाँ हमें केवल यही सामान मिला।"

सामान में कुछ संस्कृत की किताबें थीं, एक रुद्राक्ष की माला, एक तुलसी की माला और एक बौद्ध भिक्षुक की मूर्ति थी। मूर्ति पर सालों से अगरबत्तियों के धूँए की कालिख के निशान जम गये थे।

ओरी ने तुरंत हाथ जोड़ कर उस मूर्ति को प्रणाम किया, बोला, “यह बाबा के गुरु साबुनिम कीवू की मूर्ति है।" फ़िर लक्की से बोला,

“जाओ इस सामान को जहाँ से उठाया है, वहीं पर ठीक से रख कर आओ, और मूर्ति को ध्यान से ले कर जाना, टूटनी नहीं चाहिये।"
फ़िर उसने सोमचाई को चिट्ठी देने का इशारा किया।

जगदीश बाबू निढ़ाल हो कर कुर्सी पर बैठ गये, उनके चेहरे का रंग फीका पड़ गया था, मानो अपने दफ्तर तक जाने में उन्होंने बहुत मेहनत की हो।

ओरी ने उनसे पूछा, “बाबा का शिष्य कौन है? वह कहाँ रहता है और यहाँ कब आयेगा?”

“जामुन बाबा के निर्देश अनुसार, मैंने उसे आज सुबह फोन किया था। उसने कहा था कि वह जल्दी आयेगा, कल शाम तक यहाँ पहुँच जायेगा। लेकिन वह कहाँ रहता है, मुझे नहीं मालूम। वह यहाँ आता रहता है, उसकी उम्र तीस साल के आसपास की होगी।"

“उसका मोबाइल नम्बर सोमचाई को दीजिये।" नम्बर ले कर सोमचाई ने अपना लैपटॉप कम्प्यूटर खोला और उसके बारे में जानकारी खोजने लगा।

ताकानोरी ने बाबा की चिट्ठी को खोला, उसमें केवल एक कागज़ था जिस पर हिंदी में कुछ लिखा था। उसने बटेर से उसे पढ़ने के लिए कहा।

कागज़ हाथ में ले कर बटेर मुस्कराया, बोला, “यह तो कोई कविता लगती है।"

“पढ़ो।"

“चन्द्र-वधु के चरण-कमल, तीन दशानन कोसे, 
पद्मा की कमल-अँजुरी से बहता जल।
विष्णु के शंख नाद से प्रज्जवलित अंबर के सप्त ऋषि,
कंदरा में गूँजती चौदह ध्वनियाँ पिनाक की।
लौटी सति पर्वतराज पिता के घर, बोली
त्रिनेत्र कहाँ हैं, उन्हें निमंत्रण क्यों नहीं भेजा?
वहाँ जहाँ पर लाल बकरियाँ घास चरें।"

बटेर ने कविता पढ़ तो ली लेकिन उसका अनुवाद करके उसे ताकानोरी को समझाना आसान नहीं था। वह बोला, “इसमें लक्ष्मी, विष्णु और शिव जी की बातें हैं, शायद यह कोई प्रार्थना है।"

ओरी ने उससे वह कागज़ लिया और जगदीश बाबू से कहा, “आप की अंग्रेज़ी अच्छी है, आप इसका अनुवाद करके मुझे दीजिये।" उन्होंने चुपचाप उससे वह कागज़ ले लिया।

इतने में सोमचाई ने ताकानोरी को बुलाया और अपने लैपटॉप पर दिखाते हुए बोला, “इस मोबाइल नम्बर का सिम-कार्ड पहली बार 1998 में बनारस में खरीदा गया था। उसके बाद उसे 2014 में दिल्ली में बदला गया, पर नम्बर नहीं बदला। यह प्रीपेड लगता है और इसका नम्बर किसी दूसरे सिम-कार्ड से जुड़ा हुआ है, इसके बारे में पता करना आसान नहीं है, मुझे कुछ दिन लगेंगे।"

ताकानोरी सोचते हुए बोला, “बाबा के शिष्य आज चलेगा और कल शाम को पहुँचेगा, इसका मतलब है कि वह कहीं दूर रहता है। हो सकता है कि वह प्रतिमा उसके पास हो? खैर हम जल्दबाज़ी में कुछ नहीं करेंगे। आज रात को जब लोगों की भीड़ नहीं होगी, उस समय हम वह समाधी खोद कर बाबा के शव और उनकी मूर्ति की जाँच करेंगे। जब वह शिष्य यहाँ आयेगा, तो उससे इस कविता का अर्थ भी पूछेंगे।"

जगदीश बाबू, जामुन बाबा की कविता का अनुवाद करने में लगे थे, लेकिन उनके कान ताकानोरी और सोमचाई की बातें सुन रहे थे, ताकि मौका मिलते ही त्रिनेत्र को खबर कर सकें। जब उन्होंने सुना कि वह लोग गुरु जी की समाधी को खोद कर उनके शरीर को बाहर निकालने का प्रोग्राम बना रहे हैं तो उन्हें बहुत गुस्सा आया। लेकिन उन्होंने सोचा कि जामुन बाबा सामान्य व्यक्ति नहीं थे, वह अपनी समाधी की रक्षा स्वयं करेंगे।

बटेर, लक्की और मटरू को भी किसी संत पुरुष की समाधी खोदने की बात अच्छी नहीं लगी। वह गुँडे अवश्य हैं, लेकिन संतों के प्रकोप से डरते हैं। पर वह यह भी जानते हैं कि जापानी साहिब को यह काम करने से रोकना कठिन होगा।

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अगला अध्याय सोमवार 13 जुलाई 2026 से पढ़ सकते हैं। 

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