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गुरुवार, मई 28, 2026

नया धारावाहिक उपन्यास

करीब एक-डेढ़ महीना पहले मैंने एक नया फैंतेसी उपन्यास लिखा, "देवी प्रतिमा के रक्षक"। यह एक छोटा सा हल्का-फुल्का उपन्यास है, जिसमें ताकानोरी नाम का एक जापानी याकूज़ा-गुँडा, एक गुप्त-शक्ति वाली मूर्ति की खोज में हिन्दुस्तान आता है और उसका मुकाबला एक अनाथालय में काम करने वाले युवक त्रिनेत्र और वहाँ रहने वाले अनाथ बच्चे करते हैं।

साथ की तस्वीर में उपन्यास के तीन प्रधान पात्र हैं - कोरिया के बौद्ध भिक्षुक जून मिन जिन्हें उनके भारतीय भक्त जामुन बाबा के नाम से जानते हैं, जापानी याकूज़ा ताकानोरी और अनाथाश्रम में काम करने वाला त्रिनेत्र। अगले सोमवार, 1 जून 2026 से आप इस उपन्यास को इसी ब्लाग पर पढ़ सकेंगे। 

अमेज़न या अन्य ओन-लाईन पर्टल या प्रकाशक के पास अपने उपन्यास को छपवाने की जगह पर मैंने अपने उपन्यास को ब्लॉग पर डालने का निर्णय क्यों लिया, इस आलेख में मैं इसकी बात करना चाहता हूँ।  

बचपन की यादें

जब मैं छोटा था तब बहुत सी हिंदी पत्रिकाएँ छपती थीं। पहले चँदामामा पत्रिका में रामायण की कथा छपती थी, वह पढ़ता था। कुछ बड़ा हुआ तो हमारे घर पर धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी सप्ताहिक पत्रिकाएँ आती थीं। उनमें अक्सर धारावाहिक उपन्यास छपते थे, यानि हर सप्ताह उपन्यास का एक नया अध्याय पढ़ने को मिलता था। तब पत्रिका आने और उपन्यास पढने की बहुत प्रतीक्षा रहती थी। शिवानी, शंकर, किशन चंदर, अन्नपूर्णा देवी और बिमल मित्र जैसे लेखकों से मेरा इसी तरह से परिचय हुआ था।

आजकल हिंदी की वैसी साप्ताहिक पत्रिकाएँ आनी बंद हो गयीं हैं। हिंदी की कुछ मासिक पत्रिकाएँ हैं लेकिन मुझे नहीं लगता कि उपन्यास के एक अध्याय को पढ़ने के लिए कोई एक महीने तक प्रतीक्षा करेगा। बल्कि, एक महीने पहले क्या पढ़ा था, उसे याद रखना कठिन होगा। मैं सोच रहा था कि पहले जैसा धारावाहिक उपन्यास पढ़ने का अनुभव आज के पाठकों को कैसे दिया जा सकता है? तब उसे ब्लाग में छापने की बात मन में आयी।

इस ब्लाग के आलेखों को दो सौ - तीन सौ पाठक आसानी से मिल जाते हैं, और कुछ लोकप्रिय आलेखों को पढ़ने वालों की संख्या कुछ हज़ार तक पहुँच जाती है। मैंने सोचा है कि अगर मेरे उपन्यास को ब्लाग से सौ - दो सौ पाठक मिल जायें तो मेरे लिए काफ़ी हैं और इसके लिए मुझे किसी अन्य पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा।

मुझे अच्छी पैंशन मिलती है, मुझे और पैसे की आवश्यकता नहीं है। वैसे भी जहाँ तक मुझे मालूम है, आम हिंदी लेखकों की किताबों से कमायी अधिक नहीं होती।   

हिंदी किताबों के प्रकाशक 

हिंदी प्रकाशनों के बारे में जितना पढ़ा-जाना है, उससे लगता है किताब छपवाना बहुत कठिन है, और वह मेरे बस की बात नहीं है। मेरे एक अन्य उपन्यास को छापने की मित्र अरविंद मोहन की सहायता से एक प्रतिष्ठित प्रकाशक से करीब तीन साल पहले बात हुई थी, वह अभी तक नहीं छपा और न ही उसके छपने के कुछ आसार दिखाई देते हैं।

कुछ दिन पहले जाने-माने पत्रकार और लेखक प्रिय दर्शन ने कुछ दिन पहले फेसबुक पर हिंदी लेखकों की स्थिति के बारे में लिखा था, कि "लेखक का पारिश्रमिक या तो बंद हो चुका है या घटता जा रहा है। जो वेब पोर्टल पहले लेखक को पैसे देते थे, उन्होंने पारिश्रमिक देना बंद कर दिया है, क्योंकि वे 'घाटे' में चल रहे हैं। किताबों की रॉयल्टी इतनी कम मिलती है कि बताने में कोई शर्मिंदा हो जाए। ... प्रकाशन की दुनिया में पैसे देकर- या अपनी अफ़सरी या नेतागीरी के बूते किताबें बिकवा कर- किताबें छपवाने का जो नया चलन शुरू हुआ है, उसने लेखकों के सामने एक नई मुश्किल पैदा कर दी है। उनकी किताबें प्रकशकों के यहां पड़ी रहती हैं- उनका प्रकाशन टलता जाता है। किताबों के प्रचार का ज़िम्मा भी लेखक का है प्रकाशक का नहीं"।

वैसे अगर मैं चाहूँ तो मैं अपने उपन्यास को पैसे दे भी कर छपवा सकता हूँ, पर मुझे लगता है कि उससे मैं अपने उपन्यास को कुछ जान-पहचान के लोगों को भेज दूँगा, लेकिन उसे सामान्य पाठक नहीं मिलेंगे। वैसे भी यह हल्का-फुल्का जासूसी किस्म का उपन्यास है, शायद इसे ब्लाग पर अधिक लोग पढ़ेंगे।

वैसे तो दुनिया में एमाज़ॉन और नॉटनुल जैसी वेबसाईट हैं जहाँ किताबें छापी जा सकती हैं। मुझे एमाज़ॉन के किन्डल प्रकाशन का अनुभव नहीं लेकिन मैं नॉटनुल पर नियमित हिंदी पत्रिकाएँ पढ़ता हूँ। लेकिन मुझे लगता है कि अगर मुझे लेखन की कमाई नहीं चाहिए, तो मैं अन्य झंझट क्यों करूँ?

कुछ अन्य ख्याली पुलाव

एक बार उपन्यास का धारावाहिक प्रकाशन पूरा हो जायेगा तो सोचा है कि जो पाठक चाहेंगे मैं उन्हें इस उपन्यास को उन्हें ईमेल से पीडीएफ, इपब और मोबी फॉरमैट में भी भेज सकता हूँ, ताकि जो लोग मेरे ब्लाग को नहीं पढ़ना चाहते, वह भी इसे पढ सकते हैं।

मैं यह भी चाहता हूँ कि युवा लोग हिंदी में पढ़ें और लिखें। उन्हें प्रोत्साहन देने के लिए मैं युवा पाठकों के लिए "आलोचना पुरस्कार" आयोजित करने की भी सोच रहा हूँ, यानि सोचा है कि मेरे उपन्यासों की सार्थक आलोचना लिखने वाले पाँच-दस युवाओं को मैं कुछ पुरस्कार दे सकता हूँ और उनकी आलोचना को ब्लाग पर जगह दे सकता हूँ - इसके बारे में भी सोच कर अगले दिनों में कुछ निर्णय लूँगा।

आशा है कि अगले सोमवार एक जून से आप मेरे उपन्यास "देवी प्रतिमा के रक्षक" को पढ़ेंगे और मुझे अपनी राय भेजेंगे। बाकी की सब बातें अभी दिमाग में घूम रही हैं, अगले कुछ दिनों में मैं इस विषय में निर्णय लूँगा। इस बारे में मेरे साथी ब्लॉग लेखक और पाठक मुझे कुछ सलाह देना चाहें तो उसके लिए आप को अग्रिम धन्यवाद।

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