अब तक की कहानी: जापानी याकूज़ा ताकानोरी हिन्दुस्तान आया है और जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी शक्तिदायिनी हरित तारा की मूर्ति चुराना चाहता है। उससे बचने के लिए जामुन बाबा मजूली द्वीप में जीवित समाधी ले लेते हैं। ताकानोरी उनके वृद्धाश्रम में अपने गुँडो के साथ आ कर, लोगों को जान से मारने की धमकी देता है और वृद्धाश्रम में बाबा की समाधी को खोद कर भीतर देखना चाहता है। उधर, जामुन बाबा का शिष्य त्रिनेत्र गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम चलाता है, जहाँ उसके साथ पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चे और उसके मित्र की बहन आभा हैं। जब उन्हें ताकानोरी के बारे में पता चलता है तो जामुन बाबा को बचाने के लिए, वे गँगटोक से मजूली द्वीप के लिए निकल पड़ते हैं। इसके आगे पढ़िये ...
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अध्याय 14
मजूली द्वीप, असम, 3 मार्च 2026 रात्रि
शाम को जामुन बाबा की समाधी को देखने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ कम हो गयी। जब सूरज डूबा और श्रद्धालु चले गये तो वृद्धाश्रम के द्वार बंद हो गये।
ताकानोरी ने पहले से ही बाबा की समाधी को खुदवाने के लिए मजदूर बुलवा लिये थे।
जगदीश बाबू ने एक बार फ़िर उसे रोकने की कोशिश की, बोले, “आपने देखा कि आज कितने लोग उनकी समाधी पर प्रार्थना करने आये? बाबा को यहाँ के लोग बहुत मानते हैं। कल उन्हें पता चलेगा कि किसी ने उनकी समाधी को तोड़ा है तो वह बहुत गुस्सा होंगे और यहाँ दंगा भी हो सकता है।"
ताकानोरी बोला, “मुझे वार्निन्ग देने के लिए धन्यवाद। उसे खोद कर, भीतर देख कर, हम उसे बंद कर देंगे, और यह सारा काम रातों-रात पूरा हो जायेगा। कल किसी को पता नहीं लगना चाहिये कि हमने समाधी को खोदा है। ध्यान रहे कि अगर यह खबर बाहर फ़ैली तो सबसे पहले मैं तुम्हारी गर्दन काट कर, तुम्हारे सिर को गेट पर टाँग दूँगा।"उन्होंने आठ मजदूर बुलाये थे। जब बटेर ने उन्हें बताया कि क्या काम करना है तो उन्होंने तुरंत मना कर दिया, बोले कि उन्हें पैसे नहीं चाहिये, वह यह काम नहीं कर सकते।
ओरी वहीं खड़ा था, उसने अपनी कताना तलवार निकाल ली, बोला, “जो यह काम नहीं करेगा, मैं उसे काट कर यहीं गड़वा दूँगा, तब तुम अपने बाबा जी के साथ रह कर, हमेशा के लिए उनकी सेवा करते रहना।"
बटेर, लक्की और मटरू ने पिस्तौलें निकाल लीं और मजदूरों को घेर लिया। डरे हुए मजदूरों ने आखिर में फावड़े उठा लिये। सबसे पहला काम था समाधी वाली जगह से काला पत्थर हटाना। उस पत्थर को मजदूरों ने एक दिन पहले ही वहाँ रखा था, उसे हटाने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिये थी, लेकिन बहुत मेहनत के बाद भी, मजदूर उसे अपनी जगह से नहीं हिला पाये।
बटेर ने मटरू को इशारा किया, कहा, “यह सब लोग बेकार की ड्रामेबाजी कर रहे हैं। तुम वह लोहे का सरिया ले कर उसे इस पत्थर की साईड में घुसा दो, जब उस पर जोर लगायेंगे तो यह पत्थर आराम से ऊपर उठ जायेगा।"
मटरू ने लोहे का नुकीली नोक वाला सरिया लिया और जहाँ पत्थरों में जोड़ था, उस पर हथौड़े मार कर उसे वहाँ घुसाने की कोशिश की। पता नहीं कैसे, पत्थर का एक टुकड़ा टूट कर सीधा बटेर की बायीं आँख में लगा और उसे चीरता हुआ आँख के भीतर घुस गया। बटेर के हाथ से पिस्तौल छूट कर नीचे गिरी और चीख मार कर उसने हाथों से अपनी आँख को ढकने की कोशिश की, कुछ क्षणों में उसका हाथ और चेहरा उसके खून से सन गये।
जब उसकी पिस्तौल नीचे गिरी तो फर्श के पत्थर से टकरा कर उसका ट्रिगर चल गया और गोली निकल कर मटरू के दायें पैर में जा लगी। गालियाँ देते हुए मटरू वहीं पैर पकड़ कर ज़मीन पर बैठ गया, उसके हाथ से लोहे का सरिया छूट कर गिर गया।
ओरी बहुत गुस्सा हुआ, बोला, “तुम लोग आदमी हो या जोकर? एक छोटा सा काम करने में तुम लोगों ने यह क्या तमाशा लगाया है?”
जगदीश बाबू बोले, “समाधी-स्थल पर खुदाई की कोशिश करके तुमने घोर पाप किया है, इसीलिए आज यहाँ पर इतना खून बहा है। अभी भी समय है, मैं कहता हूँ कि तुम लोग रुक जाओ।"
मटरू चिल्लाया, “हमें डॉक्टर की ज़रूरत है, अस्पताल जाना है, एम्बुलैंस को बुलाओ।"
उधर बटेर "हाय, हाय" करके चिल्ला रहा था। जगदीश बाबू ने उसका हाथ हटा कर उसकी आँख को देखा, वह पत्थर उसकी आँख के भीतर घुसा हुआ था। वह बोले, “इसकी यह आँख तो पूरी नष्ट हो गयी है, इसे तुरंत अस्पताल ले जाना होगा। हमारा प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र, कमलाबाड़ी सत्र के पास है, यहाँ से बीस-बाईस किलोमीटर का रास्ता होगा, वहाँ पहुँचने में कम से कम घंटा-डेढ़ घंटा लगेगा। बीच में कुछ रास्ता कच्ची सड़क का है और अँधेरे में वहाँ जाना आसान नहीं होगा।"
बटेर को चक्कर आ रहे थे, वह बेहोश सा हो कर ज़मीन पर लेट गया। उसकी आँख से खून बहना नहीं रुका था और वह खून उसके सिर के आसपास जमा हो रहा था।
मटरू के पैर के आसपास भी फर्श खून से लाल हो गया था, वह ज़मीन पर बैठ कर चिल्ला रहा था। लक्की उनके पास खड़ा था, उसे गुस्सा आ गया, वह ताकानोरी से बोला, “अरे, इनके लिए कुछ करो, तुम इंसान हो या हैवान?”
ओरी को समझ नहीं आया कि उसने क्या कहा, लेकिन उसके बोलने के अन्दाज़ से समझ गया कि वह अपने साथियों के लिए मदद माँग रहा है, बोला, “यह सब तुम लोगों की लापरवाही से हुआ है, अब तुम उसका फ़ल भुगतो।"
जगदीश बाबू बोले, “आप की कार में इन्हें अस्पताल भेज देते हैं, बेचारे बहुत पीड़ा में हैं।”
ओरी बोला, “मेरी कार में नहीं, इन्हें अस्पताल ले जाने के लिए किसी दूसरी गाड़ी का प्रबंध करो।" फ़िर मजदूरों से बोला, “इन दोनों आदमियों को उठा कर उधर किनारे पर बिठा दो, और तुम उस पत्थर को हटाओ।"
जगदीश बाबू को मालूम था कि फुलानीबाड़ी के स्कूल के करीब एक आदमी आटोरिक्शा चलाता है, उन्होंने उसे बुलाने के लिए अपने एक व्यक्ति को भेजा।
बटेर और मटरू के घायल होने से मजदूर और भी डर गये थे, ओरी के कहने के बाद भी वह अपनी जगह से नहीं हिले, बल्कि अपने फावड़े वहीं रख कर वे वहाँ से जाने लगे।
ओरी गुस्से में आग-बबूला हो गया, उसने पिस्तौल निकाल ली और मजदूरों की ओर निशाना लगाते हुए बोला, “एक कदम भी आगे बढ़ाया तो तुम्हें भून कर रख दूँगा।"
जगदीश बाबू ने पास जा कर उसे धीरे से कहा, “गोलियाँ चलीं तो शोर होगा और आसपास के घरों से लोग यहाँ आ जायेंगे। कितनों को मारेंगे? कल सुबह तक यह बात सारे मजूली द्वीप में फ़ैल जायेगी और लोग डँडे-हँसली-छुरी-चाकू जो मिलेगा, उसे ले कर तुमसे लड़ने आ जायेंगे, तो क्या तुम पाँच सौ लोगों का सामना कर पाओगे? और उसके बाद तुम यहाँ से जीवित निकल पाओगे?”
मजदूर चले गये और ओरी वहाँ पर हाथ मसलता हुआ खड़ा रह गया। थोड़ी देर में फुलानीबाड़ी से आटो वाला आ गया तो लक्की अपने दोनों साथियों को उसमें बिठा कर उन्हें कमलाबाड़ी के प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र में ले गया।
सोमचाई ने यह सारा तमाशा दूर से देखा। जब उसे लगा कि ओरी कुछ शाँत हुआ है तो वह उसके पास आया, बोला, “आप तलवार और बंदूक, सब कुछ चला सकते हैं, लड़ भी सकते हैं, लेकिन मुझे तो सिर्फ कम्प्यूटर का काम आता है। मैंने जीवन में कभी किसी से लड़ाई नहीं की। अब हम यहाँ अकेले रह गये हैं, हमें आगे का भी सोचना होगा। यहाँ के लोगों से बात करने के लिए हमारे पास स्थानीय आदमी होने चाहियें।”
ओरी सोच में पड़ गया, बोला, “ठीक है, मैं फोन करके कुछ और आदमी बुलाता हूँ।" उसे चिंता होने लगी कि जब वह यह बातें रिकू यामागुचि को बतायेगा तो वह बहुत गुस्सा होगा कि क्या वह एक पत्थर भी नहीं हटवा पाया? अंत में उसने सोचा कि वह रिकू को कुछ नहीं बतायेगा। वह बोला, “लेकिन यहाँ से जाने से पहले, मैं इस पत्थर को हटाना चाहता हूँ।"
जब ओरी ने आगे बढ़ कर ज़मीन से लोहे का सरिया उठाया तो उस पर मटरू का खून लगा हुआ था।
जगदीश बाबू बोले, “आप ने देखा कि जिसने भी बाबा की समाधी की मर्यादा भंग करने की कोशिश की, उनका क्या हुआ? फ़िर भी आप नहीं समझे? आप क्यों अपनी जान को खतरे में डालना चाहते हैं?”
ओरी ने यह दिखाने के लिए कि उसे इन अँधविश्वासों की बिल्कुल परवाह नहीं है, हथोड़ा उठा कर उससे सरिये को पत्थरों के बीच में घुसाने के लिए मारने लगा। शायद उस पर लगे खून की वजह से सरिया चिकना हो गया था और फिसल रहा था, या शायद उसने हथोड़ा ठीक से नहीं मारा। जो भी कारण था, वह सरिया पत्थरों के बीच में जाने के बजाय, फर्श की सतह पर फ़िसल गया और ताकानोरी भी उसके पीछे फिसल कर गिरा। वैसे उसे कहीं विशेष चोट नहीं लगी लेकिन उसे गिरा हुआ देख कर जगदीश बाबू और सोमचाई हँसने लगे।
जगदीश बाबू बोले, “साहिब, अभी भी मान जाईये। जब तक बाबा खुद नहीं चाहेंगे, आप उनकी समाधी में बाधा नहीं डाल सकते।"
ओरी को बहुत गुस्सा आ रहा था, उसका मन किया कि वह जगदीश बाबू और सोमचाई, दोनों के सिर अपनी तलवार से काट दे, लेकिन उसने आत्मसंयम दिखाते हुए अपने गुस्से को दबाया और उठ कर खड़ा हुआ। सोमचाई से बोला, “वह स्कूल के लड़कों वाले वीडियो जो तुमने मुझे दिखाये थे, मैं उन्हें दोबारा देखना चाहता हूँ।"
सोमचाई ने तुरंत मोबाइल निकाल कर एक वीडियो को खोला और उसे दिखाया। ओरी ने उसे तीन-चार बार देखा, फ़िर एक जगह पर उसे रोक कर सोमचाई को दिखाया, बोला, “वह बाबा जब समाधी के लिए जा रहा था तो उसके कटोरे में एक मूर्ति थी, वह इस वीडियो में दिखती है, तुम बताओ कि वह कितनी बड़ी है?”
सोमचाई ने वीडियो को ध्यान से देखा, उसमें कटोरे में रखी मूर्ति साफ दिख रही थी। वह बोला, “उनके हाथों के आकार से तुलना करें तो वह तीन-साढ़े तीन इँच की लगती है।"
ओरी बोला, “यह वह प्रतिमा नहीं है, जो यामागुचि को चाहिये। जो हमें चाहिये, वह प्रतिमा आठ-साढ़े आठ इँच से बड़ी होनी चाहिये। यानि वह उसे अपने साथ समाधी में ले कर नहीं गया।"
जगदीश बाबू ने उनकी बातें सुनी तो मन ही मन मुस्कराये, लेकिन उन्होंने अपनी खुशी को चेहरे पर ज़ाहिर नहीं होने दिया।
ताकानोरी बोला, “इस समय यहाँ रुकने से मेरा कुछ फायदा नहीं है। बाबा का उत्तराधिकारी कल यहाँ पहुँचेगा। सोमचाई, तुम यहाँ रुको और जब वह आये तो मुझे खबर करो॑। मैं आज रात को ही नारायणपुर लौट जाता हूँ, वहाँ से अन्य आदमियों का प्रबंध भी करूँगा।"
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अगला अध्याय सोमवार 20 जुलाई 2026 को पढ़ सकते हैं
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"जो न कह सके" के आलेख पढ़ने एवं टिप्पणी के लिए डॉ. सुनील दीपक की ओर से आप का हार्दिक धन्यवाद.