सोमवार, सितंबर 07, 2026

देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 29

अब तक की कहानी: प्रतिमा की खोज में त्री, आभा और ओरी डमरू द्वीप पहुँचे जहाँ पर शक्तिवान प्रतिमा एक गुफा में छिपी थी। द्वीप पर उतरना कठिन था क्योंकि बहुत से घड़ियाल थे। तब त्री ने आभा को  दिखाया, कि कैसे वह घड़ियालों से सम्पर्क करके उन्हें वहाँ से जाने के लिए कह सकती थी। जब आभा वह करना सीख गयी तो त्री और ओरी डमरू द्वीप पर उतरने के लिए तैयार हो गये। आगे पढ़िये ...

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अध्याय 29

 डमरू द्वीप, काज़ीरंगा, असम, 8 मार्च 2026

जब वह दोनों नाव से उतरे, उस समय तट के उस हिस्से में एक भी घड़ियाल नहीं था, सभी दूसरी ओर चले गये थे, लेकिन ओरी फिर भी घबरा रहा था, उसने हाथ में अपनी तलवार पकड़ी हुई थी।

त्री ने उसका हाथ पकड़ लिया और रेत पर भागते हुए, उसे साथ खींचता हुआ तेज़ी से पहाड़ी की ओर बढ़ा। पहाड़ी के बीच-बीच में कुछ काली नुकीली चट्टानें निकल रही थीं, उन पर पैर टिका कर वह दोनों तेज़ी से ऊपर चढ़ गये। वहाँ पहुँच कर देखा कि ऊपर कोई घड़ियाल नहीं थे, तो त्री ने मुड़ कर मोटरबोट की ओर हाथ हिला कर इशारा किया, और उन्हेंं वहाँ से जाने के लिए कहा।

घड़ियालों से बच कर निकल आने से ओरी भी खुश हो गया, बोला, “आभा की शक्ति तो बहुत काम की है।"

त्री ने अपनी जेब से वसंत का बनाया नक्शा निकाला जिस पर गुफाएँ बनी हुई थीं और उसे ओरी को दिखाया, बोला, “इस समय, यहाँ पर हम लोग डमरू के बीच के संकरे हिस्से में हैं, जबकि यह गुफाएँ द्वीप के उत्तरी और दक्षिणी किनारों की ओर हैं। हमें चुनना है कि हम उत्तर से शुरु करें या दक्षिण से, तुम क्या कहते हो, हम किस ओर जायें?”

ओरी बोला, “अगर मुझे गुफाओं को नम्बर देना हो तो मैं बायें से, यानि दक्षिण से शुरु करूँगा। इसलिए हमें बायें जा कर, वहाँ से गिन कर, चौदही गुफा को खोजना चाहिये। अगर उसमें मूर्ति नहीं मिलेगी, तो हम उत्तर से शुरु करके चौदहवीं गुफा को खोज सकते हैं।"

त्री कुछ नहीं बोला, तुरंत बायीं दिशा में चल पड़ा। ओरी उसके पीछे-पीछे आया, बोला, “क्या यह सब ब्रह्मपुत्र नदी के द्वीप हैं? यह नदी तो बहुत बड़ी लगती है, इसका पाट कई किलोमीटर चौड़ा लगता है।”

“हाँ, यहाँ पर नदी का पाट छह-सात किलोमीटर चौड़ा है और यह नदी धाराओं में बँट कर बह रही है, इसलिए धाराओं के बीच में इसमें बहुत से द्वीप हैं", त्री ने बताया, “लेकिन जब बारिश का मौसम आता है, तब नदी के पानी का स्तर बढ़ जाता है और छोटे वाले सारे द्वीप पानी में पूरे डूब जाते हैं। केवल यह बड़े द्वीप, जहाँ पहाड़ियाँ है, चट्टाने हैं, यह पूरे नहीं डूबते और तब इस डमरू द्वीप पर उतरना कठिन हो जाता होगा।"

पंद्रह-बीस मिनट तक चल कर जब वह गुफाओं वाले हिस्से में पहुँचे तो देखा कि वहाँ की चट्टानें सफेद, सलेटी और मटमैले से हरे रंग के पत्थर की थीं, और वह पहले वाली काली चट्टानों की तरह नुकीली भी नहीं थीं। सदियों की सीली हवा और पानी की वजह से घिसते-घिसते उन चट्टानों का नुकीलापन खत्म हो गया था। वहाँ ऊँची-नीची पहाड़ियाँ थीं, जिनके बीच में गुफाएँ दिख रही थीं। गुफाओं के बीच में पगडँडियाँ दिख रही थीं।

त्री ने इशारा किया और बोला, “इन पगडँडियों को देखो, इनका मतलब है कि यहाँ पर श्रद्धालु आते हैं। शायद वह घड़ियाल यहाँ सारा साल नहीं रहते, केवल अँडे देने के समय आते हैं और फिर चले जाते हैं। क्योंकि अगर वह घड़ियाल यहाँ सारा साल रहते हों तो तीर्थयात्री यहाँ नहीं आ सकते।"

ओरी बोला, “मैंने गिना है, उधर तीन गुफाए हैं, यह सामने वाली चौथी गुफा है। ऐसे गिन कर हमें चौदह नम्बर की गुफा को पहले देखना चाहिये। मैंने अन्वेषण-किरण से देखा है, उस ओर से मुझे शक्ति का एक प्रबल स्रोत दिख रहा है। इसका मतलब है कि हम सही जगह पर आये हैं।"

त्री को पीछे छोड़ कर, अब ओरी तेज़ी से आगे बढ़ा, वह उस मूर्ति को देखने के लिए बेचैन था। जब उसे चौदहवीं गुफा दिखी तो सीधा उसमें घुस गया। उस गुफा का रास्ता कुछ नीचे जा कर था और उसका द्वार थोड़ा छोटा था, उसमें घुसने के लिए उसे नीचे झुकना पड़ा। भीतर पहुँचा तो देखा कि गुफा का कक्ष बहुत बड़ा है और उसकी छत में एक छेद है जहाँ से भीतर सूरज की रोशनी आ रही है। गुफा की खुरदरी दीवारों पर कत्थई खड़िया मिट्टी और सफेद चूने से आदिमानवों के बनाये चित्र दिख रहे थे, जिनमें विभिन्न पशु-पक्षी और उनका शिकार करते हुए मानव दिख रहे थे।

जब त्री वहाँ पहुँचा तो देखा कि ओरी एक खाली गुफा में खड़ा है, वहाँ कोई मूर्ति नहीं दिख रही थी।

ओरी बोला, “इस गुफा की धरती के भीतर एक शक्ति-स्रोत छुपा हुआ है, मैं उसे महसूस कर सकता हूँ, लेकिन मैं समझ नहीं पाया कि उसका रास्ता कहाँ से है।"

त्री हँसा, बोला, “तुम वह कविता भूल गये? उसमें गुरु जी पूछते हैं कि त्रिनेत्र कहाँ है? इसका मतलब है कि मेरे बिना तुम्हें वह मूर्ति नहीं मिलेगी।"

वह घूम कर गुफा की दीवारों को देखने लगा, बोला, “देखो, क्या कहीं पर शिव जी का कोई चिन्ह दिख रहा है? गुरु जी जब त्रिनेत्र के बारे में पूछ रहे हैं, इसका मतलब है कि हमें इस गुफा में शिव जी के किसी चिन्ह को खोजना है।”

ओरी को पता नहीं था कि शिव जी कौन से चिन्ह होते हैं, उसे त्री की बात समझ में नहीं आई, तो त्री बोला, “त्रिशूल, डमरू या नाग देवता या चंद्रमा, यह सभी शिव जी के चिन्ह हैं, क्या गुफा की दीवारों पर इनमें से कुछ दिख रहा है?”
दोनों गुफा में घूम-घूम कर चित्रों को देखने लगे, तब ओरी बोला, “देखो, इधर एक घड़ियाल बना है।"

त्री वहाँ गया तो देखा कि वहाँ घड़ियाल के ऊपर लम्बे बालों वाली एक युवती की आकृति बनी है, बोला, “हाँ, यही है शिव जी का चिन्ह, गंगा माँ और उनका वाहन घड़ियाल। गंगा माँ भी शिव जी की जटाओं में ही रहती हैं।"

उसने पास जा कर गंगा की आकृति पर हाथ के सामने हाथ फिराया तो पीछे से सर्र-सर्र की आवाज़ आयी और गुफा के बीचों-बीच, ज़मीन में एक रास्ता खुल गया।  वहाँ से नीचे जाती हुई बारह सीढ़ियाँ दिख रही थीं और अंत में एक छोटा सा गोल तालाब बना था, जिसके बीच में सफेद पत्थर की, हँस पर बैठी हुई, वीणावादिनी सरस्वती की मूर्ति लगी थी। ओरी ने महसूस किया कि उस मूर्ति से शक्ति का प्रचंड स्पंदन निकल रहा था, वह तुरंत सीढ़ियाँ उतर कर नीचे गया।

त्री थोड़ी देर तक ऊपर ही खड़ा रहा, फिर धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतर कर नीचे पहुँचा तो देखा कि ओरी सरस्वती प्रतिमा के सामने हाथ जोड़े हुए, आँखें बंद करके खड़ा है। वह भी उसके पास जा कर हाथ जोड कर खड़ा हो गया।

कुछ देर के बाद जब त्री ने आँखें खोलीं तो देखा कि ओरी की आँखों से आँसू बह रहे हैं। वह कुछ नहीं बोला।

ओरी  उसी जगह पर घुटनों के बल बैठ गया, धीरे से बोला, “इस शक्ति में स्नान करना मेरे लिए अभूतपूर्व अनुभव है। मुझे लगता है कि शक्ति की लहरें मेरे भीतर, मेरे तन और मन के सभी घावों को भर कर मुझे शांति दे रही हैं। इस पवित्र मूर्ति को क्या यहाँ से ले जाना उचित होगा?”

त्री बोला, “मैंने तुम्हें बताया था न कि यह मूर्ति गुरु जी ने पाँच साल पहले बनवायी थी। माँ तारा की हरिताश्म मूर्ति इससे बहुत छोटी थी, उसके अधिकतर टुकड़े इस प्रतिमा में लगे हैं, जैसे कि उनके माथे की बिन्दी में, उनके गले के हार में और उनकी करधनी के मोतियों में। तुम इसे लेने आये हो, ले जाओ, मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि कुछ महीनों में इस जगह पर मैं अपने हाथों से माँ सरस्वती की ऐसी ही एक नयी मूर्ति बना कर लगाऊँगा ताकि श्रद्धालुओं की पूजा में बाधा नहीं आये।"

ओरी चुपचाप मूर्ति को देखता रहा।

त्री बोला, “अब मुझे गुरु जी की कविता की वह पंक्ति समझ में आयी जिसमें वह सती के पर्वतराज के यहाँ लौटने की बात करते हैं। सती यानि पार्वती, वह हिमालय पर्वत की बेटी और शिव की पत्नि थीं और अपने पिता के घर यज्ञ के लिए लौटी थीं। शायद गुरु जी कहना चाहते हैं कि उसी तरह से माँ सरस्वती भी प्रकृति का हिस्सा बन कर यहाँ पर लौटी हैं।"

ओरी बोला, “मैं इस मूर्ति को यहाँ से नहीं ले जा सकता, मैं इसे नहीं तोड सकता। मुझे लगता है कि इस पवित्र जगह से इस मूर्ति को हटाना पाप होगा।"

त्री मुस्कराया, बोला, “तुम्हें कुछ तोड़ना नहीं पड़ेगा। मैं अपने गुरु जी को जानता हूँ। अगर वह नहीं चाहते कि तुम इस प्रतिमा को यहाँ से ले कर जाओ, तो वह उस कविता को लिख कर नहीं जाते। उन्होंने ही हमें यहाँ पर आने का रास्ता दिखाया है, तुम संकोच मत करो। इस प्रतिमा को उठा कर देखो, यह आसानी से उठ जायेगी, तुम्हें कुछ तोड़-फोड़ करने की आवश्यकता ही नहीं होगी।"

जब उसने देखा कि ओरी वहाँ पर निश्चल खड़ा है, आगे नहीं बढ़ रहा, तो त्री उस तालाब में घुसा। उसका पानी गहरा नहीं था। पानी के बीच में जा कर उसने माँ के चरणों में सिर झुका कर प्रणाम किया, फिर उसे दोनों हाथों में उठा कर अपने सिर पर रख लिया। वह प्रतिमा पत्थर के चबूतरे पर रखी हुई थी, उससे जुड़ी हुई नहीं थी, इसलिए आसानी से उठायी गयी। वह भीतर से खोखली थी, इसलिए भारी नहीं थी और उसे उठाना आसान था।

तालाब से निकल कर त्री सीढ़ियाँ चढ़ने लगा, लेकिन ओरी अपनी जगह से नहीं हिला, वह मूर्ति की खाली जगह को देख रहा था और उसके आँसू नहीं रुक रहे थे।

त्री ने उसे कहा, “तुम अपनी आँखें बंद करके, उस मूर्ति के स्थान को अपने मन की दृष्टि से देखो, तुम्हें उस खाली जगह पर एक ज्योति की लौ दिखेगी।" वह ऊपर आया और मूर्ति के साथ ज़मीन पर बैठ गया, बोला, “मैं सोचता था कि इन पाँच साल में, इसकी शक्ति हम सबसे दूर रह कर कमज़ोर हो गयी होगी, लेकिन यह तो अब भी बहुत प्रबल है। इसे छूने में एक अजीब से अनुभूति होती है, लगता है कि जैसे शक्ति की धारा मेरे भीतर बह रही हो।"

ओरी कुछ देर तक तालाब के पास आँखें बंद करके बैठा रहा। जैसा कि त्री ने कहा था, आँखें बंद करके उसे मूर्ति की जगह पर एक ज्योति-पुंज दिख रहा था।

जब वह ऊपर आया तो उसने देखा कि छत के छेद से आने वाली सूर्य की किरणें सीधा मूर्ति पर पड़ रही थी और उसके साथ ज़मीन पर बैठा, मुस्कराता हुआ त्री भी उसी रोशनी में प्रज्जवलित हो रहा था।

ताकानोरी उसे देखता रह गया, फिर धीरे से बोला, “यह एक दिव्य प्रतिमा है और यामागुचि बड़ा गुँडा है। उसके जूआघर हैं, वह युवतियों को वैश्या बनवा कर उनसे धँधा करवाता है, और नवजवानों को नशा बेचता है, इस दिव्य प्रतिमा को उसके पास ले कर जाना क्या सही होगा?”

त्री बोला, “मेरे गुरु जी कहते हैं कि हर बात में हमें मैं, मेरा, मुझे, वगैरा नहीं सोचना चाहिये। हमें याद रखना चाहिये कि हम केवल निमित्त हैं, हमारे पीछे इच्छा माँ तारा, बौद्धिसत्व और माँ सरस्वती की है। शायद वह तुम्हारे यामागुचि सान के जीवन की दिशा बदलना चाहते हैं, इसीलिए गुरु जी चाहते हैं कि तुम यह प्रतिमा उनके पास ले कर जाओ।”

ओरी ने आगे बढ़ कर प्रतिमा को छुआ, बोला, “मैं मां के सिर की कसम खाता हूँ कि इसके बाद मैं यामागुचि के याकूज़ा के जीवन को त्याग दूँगा। इस मूर्ति को उनके पास ले जा कर, मेरा और उनका रिश्ता समाप्त हो जायेगा।"

त्री उठ कर खड़ा हुआ, उसने प्रतिमा को उठाया और उसे ताकानोरी को दिया, बोला, “डरो नहीं, इसे हाथ में ले कर देखो। सौभाग्य से नियति ने तुम्हें यह मौका दिया है कि तुम इसकी शक्ति को अपने तन-मन और अंतरात्मा में महसूस करो, इस मौके को व्यर्थ मत जाने दो। चलो, अब हम वापस चलें।"

फिर वह गुफा की दीवार पर बने गँगा माँ और घड़ियाल के चित्र की ओर गया और उसके सामने हाथ फेरा, तो सर्र-सर्र की आवाज़ से ज़मीन में खुला रास्ता फिर से बंद हो गया।

वह दोनों गुफा से बाहर निकले और मोटरबोट की ओर चल पड़े। उन्हें वहाँ पर आये हुए करीब एक घंटा हुआ था लेकिन उन्हें लग रहा था मानो वह वहाँ पर बहुत समय से हों। ओरी ने मूर्ति को अपनी छाती से लगाया हुआ था।

जब वह द्वीप के घड़ियालों वाले तट के पास पहुँचे तो त्री ने पहाड़ी से हाथ हिला कर आभा को इशारा किया, क्योंकि वह रास्ता फिर से घड़ियालों से भर गया था। आभा ने ध्यान लगाया तो थोड़ी देर में ही घड़ियाल उनका रास्ता छोड कर एक ओर चले गये।

मोटरबोट की ओर जाते हुए त्री बोला, “थोड़े से अभ्यास से ही, आभा उन घड़ियालों से सम्पर्क बनाने में कुशल हो गयी है। अब उसकी शक्ति का विकास और भी आसान हो जायेगा।"

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उपन्यास का अगला भाग बृहस्पतिवार 10 सितम्बर को पढ़ सकते हैं

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