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शुक्रवार, सितंबर 18, 2026

क्या पढ़ा (2) - कहानी, कविता, आलेख

कुछ माह पहले मैंने निश्चय किया था कि मैं अपनी डायरी लिखूँगा कि हिंदी में क्या पढ़ा जो अच्छा लगा और इस डायरी का पहला भाग अगस्त के प्रारम्भ में लिखा था। आज इस डायरी का दूसरा भाग प्रस्तुत है।

मैं अधिकतर तीन भाषाओं में लिखता-पढ़ता हूँ - हिंदी, अंग्रेज़ी और इतालवी, पर कभी-कभी फ्राँसिसी और पुर्तगाली में भी पढ़ना पड़ता है। जैसे कि सुबह हिंदी, अंग्रेज़ी और इतालवी में अखबार पढ़ी, फिर कोई हिंदी पत्रिका पढ़ी, दोपहर में अंग्रेज़ी उपन्यास पढ़ा और रात को सोने से पहले कोई इतालवी पत्रिका पढ़ी। सपने भी इन तीनों भाषाओं में देखता हूँ। मेरे विचार में हर भाषा में हमारे सोचने का तरीका बदल जाता है, तो मेरे इस तरह से तीनों भाषाओं में लगातार बदलने से मेरे सोचने पर क्या असर पड़ता है, यह प्रश्न भी अक्सर मन में उठता है लेकिन समझ नहीं आता कि उसका उत्तर कैसे खोजा जाये?

इस बार मैंने जो हिंदी में पढ़ा उसे तीन भागों में बाँटा है - आलेख, कहानियाँ और कविताएँ। यह सब कुछ मैंने विभिन्न पत्रिकाओं में ॲानलाइन पोर्टल नॉटनुल पर पढ़ा।


 

खैर, अब उस पर आते हैं कि इस बार मुझे क्या पढ़ना अच्छा लगा, और शुरुआत करते हैं आलेखों से। अच्छा लगने के मूल्यांकन की मेरी पहली और सबसे बड़ी कसौटी है कि मैं किसी कहानी या आलेख को अंत तक पढ़ पाया या नहीं। पढ़ने को इतना कुछ है और दिन में केवल 24 घंटे होते हैं, जिसमें रुचि नहीं जागे, उसे तुरंत वहीं छोड देता हूँ।

हिंदी आलेख 

हँस पत्रिका के अगस्त 2026 अंक में अनुज लुगुन का अतिथि संपादकीय: हँस का यह अंक जनजातियों की संस्कृति, भाषाओं और जीवन पर केन्द्रित है, मुझे यह अंक पढ़ना बहुत अच्छा लगा। लुगुन जी अपने सम्पादकीय में 1970 के दशक में शुरु हुआ कोइलकारो बांध के विरुद्ध जन आंदोलन जो तीस सालों तक चला, से शुरु करके विभिन्न विषयों को छूते हैं जैसे कि - मूलनिवासियों के सांस्कृतिक-अध्यात्मिक पुनर्निवास की माँग, आदिवासी नागरिकों को दो संवैधानिक अनुच्छेदों में बाँटना (पाँचवीं और छठी अनुसूची), कानजी पटेल के "अनुत्तरित लोग" में आदिवासी कवियों का संकलन जिसमें 141 आदिवासी भाषाओं में 382 कवियों की कविताएँ मूलभाषा और हिंदी में संकलित की गयीं, आदिवासी यानि असुर-राक्षस के रूप में स्वयं अपनेआप को देखते हैं।

हँस के इसी अंक में सावित्री बड़ाईक का एक रोचक आलेख भी है, "असुरों की सांस्कृतिक विरासत का दस्तावेज", जिसमें वह बताती हैं कि हिंदू ग्रंथों में जिन्हें असुर कहा गया है वह छोटानागपुर के पठार में रहते हैं, आदि। इस आलेख को पढ़ कर सोच रहा था की प्राचीन सीरिया के असुर राजाओं, जैसे कि असुर बनिपाल, जिनकी कहानियाँ और इतिहास मेसोपोटेमिया की पक्की मिट्टी की तख्तियों पर मिली हैं और भारत की असुर जनजातियों में क्या सम्बंध था या कोई सीधा सम्बंध नहीं था? 

हँस में ही अनामिका अनु द्वारा लिखी तीजन बाई की जीवनी का एक अंश, शीर्षक "अपनी नाक खुद सम्भाले यह समाज" जिसमें तेरह साल की लड़की के घर से निकाले जाने की बात है क्योंकि पाण्डवानी को ऊँचे स्वर और जोश में ही गा कर उसका अभ्यास करना पड़ता है और कोई उसे गाते हुए सुन लेता था, अच्छा लगा। इस आलेख की पहली पंक्ति, "धूँए से उठी, लोगों की आँखों में लगी", बहुत सुंदर लगी, उसमें तीजन बाई के जीवन का सार दिखता है।

पाखी के अगस्त अंक में "पाखी संवाद - जहाँ शब्द डरते नहीं" में शिवकुमार बटालवी और ताराशंकर वंद्योपाध्याय का स्मृति आलेख अच्छा लगा। वंद्योपाध्याय के लेखन की बात करते हुए कहते हैं, "इस उपन्यास में उन्होंने समाज के उस हिस्से को केन्द्र में रखा जिसे मुख्यधारा का साहित्य अक्सर अनदेखा कर देता था। वहाँ के लोगों की भाषा, उनके रीति-रिवाज, उनके भय, उनकी आस्थाएँ और उनके सपने - सब कुछ इतनी प्रमाणिकता से चित्रित है कि पाठक स्वयं उस संसार का हिस्सा बन जाते हैं।" मुझे भी हिंदी कहानियाँ-उपन्यास पढ़ते समय, लेखकों का यही कौशल आकर्षित करता है, कि अनदेखे-अनजाने लोगों के जीवन की झलक मिले। पाखी संवाद के इन आलेखों से मुझे उनकी पाखी संवाद यूट्यूब की चैनल का भी पता चला, और अब उनके विडियो देखने-सुनने का मौका भी मिलेगा।  

अकार पत्रिका के अगस्त अंक के प्रारम्भ और अंत में मुख्यपृष्ठों के पीछे मिर्ज़ा हादी रुसवा के उपन्यास उमराव जान अदा के हिंदी अनुवाद का एक छोटा सा अंश दिया है जो बहुत सुंदर लगा। इस अंश में पता चलता है कि उमराव जान के समय में तवायफों की तालीम में और उपन्यास लिखने वाले लेखक को, शास्त्रीय संगीत के विभिन्न रागों और उनके सुरों की गहरी पहचान होती थी। यह जान कर भी थोड़ा सा आश्चर्य हुआ कि उपन्यास का यह अनुवाद गुलशन नन्दा ने किया था। अपने समय में गुलशन नन्दा जी शायद हिंदी के सबसे प्रसिद्ध लेखक थे। बचपन की रेलयात्राओं में मुझे उनके विभिन्न उपन्यास पढ़ना याद है। उनके बहुत से उपन्यासों पर सफल फिल्में भी बनी थीं। लेकिन जैसा हिंदी लेखन जगत में अक्सर होता है, लोकप्रियता को अ-साहित्यिक माना जाता है, और जब हिंदी के बड़े लेखकों की बात होती है, शायद कोई गुलशन नन्दा को उनमें नहीं गिनता।

अकार पत्रिका के अगस्त अंक में प्रियंवद जी का संपादकीय, जहाँगीर के अंग्रेज सलाहकार हॉकिन्स द्वारा लिखे बादशाह जहाँगीर के एक दिन के ब्यौरे के बारे में है। उसे पढ़ते हुए सोच रहा कि उस जमाने में और आज में किंतना अंतर आया है, जो चीजे हमें इतनी आसानी से मिल जाती हैं कि हम उनके बारे में सोचते भी नहीं हैं, उस समय वह बादशाह को भी नहीं मिलती थीं। अगर जहाँगीर के पास ट्विटर, टिकटॉक, इंस्टाग्राम होते तो वह अपना सारा दिन कैसे बिताते? अगर उनके पास फ्रिज होता तो वह उसमें अपने लिए कौन सी आईसक्रीम रखवाते? अगर उनके पास टीवी होता तो क्या वह किस तरह के प्रोग्राम व फिल्में देखते या शायद वह भी अमिताभ बच्चन के फैन हो जाते? अगर उनके पास माईक्रोवेव होता तो क्या वह अपने लिए कॉफी बना कर पीते? या फिर, हवाई जहाज में घूमते हुए ट्रम्प या पुतिन से दोस्ती बनाते? या फिर, अनुराग कश्यप की फिल्म देख कर कहते, "कितनी गालियाँ लगाता है यह आदमी अपनी फिल्मों में, लाहोल विला कुव्वत! इसे फाँसी पर चढ़ा दिया जाये।"

कथाक्रम के सितम्बर अंक में ही लोकबाबू के उपन्यास "बस्तर-बस्तर" पर जयप्रकाश मानस का आलोचनात्मक आलेख, "जहाँ जंगल स्मृति है और आदमी धीरे-धीरे गायब होता हुआ वर्तमान" अच्छा लगा और इसे पढ़ कर "बस्तर-बस्तर" को पढ़ने की इच्छा भी हुई। मानस जी लिखते हैं, "बस्तर रूपक है उस देश का, जो अपने ही भीतर कुछ दूर छूट गया है - जहाँ विकास की सड़कें पहुँचते-पहुँचते थक जाती हैं, और पगडँडियाँ अब भी अपने होने पर अड़ी रहती हैं। बस्तर कविता है उस आदिम लय की जिसे किसी छंद में बांधना सम्भव नही; वह महुए की गंध की तरह फैलती है - धीरे, अनाम, लेकिन गहरे तक उतरती हुई।"

कथाक्रम के सितम्बर अंक में अर्चना पैन्यूली के उपन्यास "अलकनंदा सुन" पर संजीव जयसवाल 'संजय' का आलोचनात्मक आलेख, "माटी की गंध और स्मृतियों की सरिता" भी अच्छा लगा। इस उपन्यास के कथन-विन्यास के बारे में उन्होंने लिखा है, "यह उपन्यास शिवानंद के जीवन को किसी सर्वज्ञ कथावचाक के माध्यम से नहीं, बल्कि उसके बच्चों की दृष्टि से प्रस्तुत करता है - पहले बड़ा बेटा, फिर दूसरा बेटा और अंत में पुत्री। इस क्रमिक परिवर्तन से कथा केवल आगे ही नहीं बढ़ती, बल्कि भावनात्मक रूप से अधिक गहरी होती जाती है।" इस बात से भी इस उपन्यास पढ़ने का मन किया।

बनास जन पत्रिका के 88वें अंक में विद्यासागर नौटियाल के बारे में पढ़ रहा था। उनके लेखन के बारे में लिखा है: "उनके उपन्यासों और कहानियों का संसार उत्तराखंड के साधारण लोगों के जीवन संघर्षों का दस्तावेज बन गया है। वह सहज भाषा और सरल कथा-शिल्प में अपने लोगों की यातनाओं को दर्ज करते हैं। इतिहास और संस्कृति उनके लिए गौरव का स्मारक न हो कर साधारण लोगों की मुक्ति चेतना के वाहक बनते हैं।" ऐसे ही बातें कुछ अन्य आलेखों में भी थीं और मैंने अक्सर अन्य लेखकों के बारे में भी पढ़ी हैं। इसे पढ़ कर सोच रहा था कि क्यों हिंदी  में लेखकों के साधारण आदमियों की पीड़ा, शोषण, यातनाओं की बात करना ही अच्छा साहित्य समझा जाता है? जबकि मेरे मन में वही किताबें रहती हैं जिनमें मानव जीवन का और रिश्तों का सजीव चित्रण हो, उनमें केवल दुख, पीड़ा और कठिनाईयाँ देखना उसका अधूरापन नहीं बन जायेगा? मैंने नौटियाल जी की कोई किताब नहीं पढ़ी इसलिए मेरी यह टिप्पणी उनके लेखन के बारे में नहीं है, बल्कि अच्छा साहित्यकार किसे माना जाये का मूल्यांकन करने वाली दृष्टि के बारे में है। 

तद्भव पत्रिका के जनवरी-जून 2026 अंक में विश्वनाथ त्रिपाठी के संस्मरण "अस निबहुर देसू" का आठवाँ भाग बहुत रुचि से पढ़ा जिसमें उनके दिल्ली आने और यहाँ रहने के 1950-60 के वर्णन हैं। उनकी बातें पढ़ कर मुझे भी अपनी बचपन की वह घटनाएँ याद आयीं, जब मैं बच्चा था। उनका जामामस्जिद जा कर कबाब खाना, जमुनापार दिलशाद गार्डन में रहने के बारे में कहना "नानक दुखिया सब संसार, सबसे दुखिया जमुना पार", श्रीकाँत वर्मा और मन्मथनाथ गुप्त की चीन के बारे में बहस, सैम मानिकशा और जनरल करिअप्पा की बातें, ऐसी बहुत सी घटनाओं के बारे में पढ़ना अच्छा लगा।

तद्भव में ही राजाराम भादू का धर्मवीर भारती की जन्म शताब्दी के अवसर पर "एक पुनरावलोकन" आलेख भी अच्छा लगा। 1983-84 के आसपास मेरी एक कहानी धर्मयुग में छपी थी, तब भारती जी से कुछ पत्रचार हुआ था। वह मेरे पिता को जानते थे, दोनों इलाहाबाद के थे, करीब-करीब हमउम्र थे और दोनों के परिवार आर्यसमाजी थे। मैंने लड़कपन में भारती की "गुनाहों का देवता" पढ़ी थी और उनके लाखों प्रशंसकों में मैं भी आ गया था। मैं उनकी एक कविता को भी बहुत पसंद करता हूँ - "दिन यूँ ही बीत गया, अंजुरी में भरा हुआ जल जैसे रीत गया।"

तद्भव में आकांक्षा बरनवाल के लम्बे आलेख "परंपरा का मूल्यांकन और औपनिवेशिक आधुनिकता" में महाभारत के संदर्भ में, एक ओर है पश्चिमी तर्क, समझ और श्रेणीकरण, और दूसरी ओर हैं भारतीय समझ और परम्परा। वह इन दोनों के बीच के विरोधाभासों पर पश्चिमी सोच से प्रभावित महाभारत के "क्रिटिकल एडिशन" बना कर ग्रंथ के "मूल तथा प्रमाणिक" रूपों की खोज-दृष्टि, और दूसरी ओर, उसके विभिन्न संस्करणों-लेखकों की गतिशील, समय के साथ बदलने वाली भारतीय समझ की दृष्टि के अंतरों की बात करती हैं।

इस सिलसिले में वह लिखती हैं, "जो विद्वान वैज्ञानिक पाठालोचन की पद्धिति और मूल पाठ की अवधारणा के समर्थक हैं उन्हें शिकायत है कि सुकथांकर और उनके सहयोगियों ने बहुत से परवर्ती प्रक्षेप अपने क्रिटिकल एडिशन में शामिल कर लिए। जो विद्वान महाभारत को एक स्थिर रचना की बजाय एक गतिशील और जीवंत प्रवाह की तरह देखते हैं उन्हें यह शिकायत है कि क्रिटिकल एडिशन के संपादकों ने ऐसे प्रसंगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया जो भारतीय जनमानस में महाभारत की प्रसिद्धि और लोकप्रियता के आधारस्तंभ हैं।" इस संदर्भ में वह एस. एन. बालगंगाधर की बात रखती हैं, "इतिहास हमें 'तथ्य' देता है, अतीत हमें 'स्मृति' और 'मूल्य' देता है।" अपने निष्कर्ष में वह कहती हैं कि "आज हम जिस 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' का उदय देख रहे हैं, विडम्बना यह है कि वह भी उसी औपनिवेशिक जाल में फंसा हुआ है जिसका शिकार बंकिमचंद्र और सुकथांकर जैसे विद्वान हुए थे। एक तरफ आज का राजनीतिक विमर्श पश्चिम का विरोध करता है और भारतीयता की बात करता है, किन्तु दूसरी तरफ अपनी महानता सिद्ध करने के लिए वह पैमाना (standard) आज भी पश्चिम का ही उपयोग कर रहा है। जब आज का नैतृत्व या उसके बुद्धिजीवि यह दावा करते हैं कि 'महाभारत काल में इंटरनेट था' या 'वैदिक काम में हवाई जहाज थे' तो वह अनजाने में यह स्वीकार कर रहे होते हैं कि महान होने का एकमात्र अर्थ तकनीक और विज्ञान में आगे होना है, जो पूरी तरह से एक आधुनिक, पश्चिमी पैमाना है।" यह आलेख पढ़ कर बहुत सी बातें और प्रश्न मन में उठे और इसलिए यह बहुत अच्छा लगा। 

हिंदी कहानियाँ

विभिन्न पत्रिकाएँ पढ़ते हुए एक बात मेरे मन में आई कि अंग्रेजी, इतालवी, फ्रैंच आदि भाषाओं में विभिन्न श्रेणियों की कहानियाँ होती हैं - रोमांस, रहस्य, जासूसी, एडवैंचर, साईंस फिक्शन, फैतासी, डरावनी, आदि। भारत में भी अंग्रेजी के लेखन में अधिक विविधता है। लेकिन मुझे लगता है कि हिंदी कहानियों का संसार अधिकतर दुखों, संघर्ष, भेद-भाव, परिवार, जैसे दायरों आदि में ही घूमता रहता है, उसमें उतनी विविधता नहीं होती। यही बात मृणाल पाण्डे जी के एक साक्षात्कार में भी सुनी, जब उनसे पूछा गया कि उनकी कहानियाँ मध्यम वर्ग पर क्यों होती हैं, और गरीब, शोषित वर्ग के लोगों के बारे में क्यों नहीं होतीं? यानि लेखकों को गम्भीरता से तभी लिया जा सकता है अगर वह कुछ विशेष विषयों पर ही लिखें? पर ऐसा करना क्या हिंदी साहित्य को पिंजरों में बंद करना नहीं हो जायेगा?

हँस में ज्ञानचन्द बागड़ी की कहानी "धधकती ज़मीन" में मणिपुर की स्थिति की कहानी है जिसमें एक बाहर से आया प्रोफैसर आदित्य समझना चाहता है कि लड़ाईयाँ किसके बीच और क्यों हो रही है, लेकिन उनकी बातें स्थिति समझने में विशेष मदद नहीं करती। कहानी का भूगौलिक परिपेक्ष्य समझ में नहीं आता कि जिन गाँवों-जँगलों की बात हो रही है वे कहाँ हैं, न ही उसके पात्र किन जनजातियों के हैं, लड़ाई किसके बीच है, यह सब कुछ समझ नहीं आता। शायद यही वहाँ की सच्चाई है कि कुछ भी समझना कठिन है। एक जगह पर एक पात्र कहता है, कि शहर के लोग पहाड़ी लोगों की ज़मीन लेने के लिए यह कर रहे हैं। दूसरी जगह एक पात्र समझाता है कि विभिन्न जनजातियाँ हैं, राजनीति करने वाले हैं, उग्रवादी हैं, सेना वाले हैं, बाहरी ताकते हैं, सबका इस लड़ाई में हाथ है, सब अपने को सही समझते हैं और दूसरे को गलत। यह कहानी लड़ने वालों के धर्मों की बात नहीं करती। कहानी में घरों का जलना, लोगों का मरना, परिवारों का विस्थापित होना, आदि घटनाओं का दर्द महसूस होता है, लेकिन उसका क्या होगा या क्या करना चाहिये, इसकी झलक नहीं मिलती।

हँस में अनिशा मिंज की कहानी "फिर एक कोड़ा राजी" में एक चाय बागान में रहने वाली बुघनी नाम की बच्ची की कहानी है, जो स्कूल नहीं जाती क्योंकि उसकी शिक्षका कहती है कि वह हिंदी ठीक से नहीं जानती। बुघनी माँ के पीछे-पीछे चाय-बागान में जाती है, वहाँ काम में माँ की मदद करती है और लोगों से उनके अपने गाँव छोड कर चाय-बागानों में आने के इतिहास की बातें पूछती है। दिन समाप्त होता तो माँ को पगार अधिक मिलती है क्योंकि बुघनी की सहायता से उसने पत्तियाँ अधिक तोड़ी हैं। लेकिन रात को झोपड़ी में आग लगने से उसके माता-पिता मर जाते हैं, और कहानी का अंतिम भाग कलकत्ता में है जहाँ सोलह साल की बघनी एक घर में काम करती है, शोषित होती है और चायबगान के दिनों को याद करती है। कहानी की बनावट कमज़ोर है, लेकिन उसकी चायबागान की बोली और उनके गीत, यह दोनों बातें अच्छी लगीं।

हँस में विनोद कुमार की कहानी "वह राम नहीं था" में दो बेटियों की माँ आदिवासी परिवार की सुमारी है, जो एक "बाहरी" आदमी के साथ चली जाती है और कुछ महीनों बाद घर लौट आती है। मास्टर जी जो इस कहानी को सुना रहे हैं, इस बात को सुन कर उसकी तुलना रामायण के राम और गर्भवति सीता के वनवास से करते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि एक स्त्री-पुरुष के रिश्ते को केवल एक अच्छा या बुरा में बाँटना इतना आसान नहीं लगता, क्योंकि इसमें हम उनकी भावनाओं को अनदेखा कर रहे हैं। अपनी मर्जी से घर छोड़ कर नये साथी के साथ जाने के कुछ महीनों बाद पहले साथी के पास लौट आना, यह आदिवासी परिवार में हो या गैर-आदिवासी परिवार में हो, उसे केवल यौन-शुचिता की दृष्टि से तोलना, मुझे अधूरा सा लगता है। अगर दूसरे मर्द के साथ गयी स्त्री के घर वापस लौटने पर उसे स्वीकारना विकासशीलता का मापदंड है, तब दूसरी औरतों के साथ जाने वाले पुरुष के घर लौटने पर स्वीकारना क्या होगा? खैर इस कहानी ने इस विषय के बारे में सोचने का मौका दिया, इसलिए यह कहानी अच्छी लगी।

पाखी के अगस्त अंक में विद्याभूषण की कहानी "बनवारी बाबू का मकान" में उत्तर भारत के छोटे शहर के पारिवारिक रिश्तों की बातें हैं, जहाँ दो कमरों के घर में महीनों रहने वाले भाँजे-भतीजे ही नहीं, भाँजे के मित्र पेयिन्ग गैस्ट भी हैं, पैसा अधिक कमाने वाले बेटे का परिवार के निर्णयों पर अधिकार है, बेटी की शादी करने के लिए दान-दहेज क्या और कैसे तैयार किया जाये की बातें भी हैं, और सबसे बड़ी बात की मन-मुटाव हो या पुरानी यादों के साथ हँसना-हँसाना, जीवन नहीं रुकता, वह चलता रहता है। 

अकार में जीवेश प्रभाकर की कहानी "फ्री बर्डस" में धर्म और रिश्तों की नाजुकता की बात बहुत अच्छे तरीके से कही गयी है। रानी की माँ मुसलमान हैं और पिता हिंदू। समय के साथ उनके अपने परिवारों के साथ रिश्ते बदलते हैं लेकिन रानी के भाई की घर वालों द्वारा पक्की की हुई शादी में दिक्कत आती हैं क्योंकि लोग उनके परिवार के बारे में जान कर मना कर देते हैं। रानी के विवाह में भी मुश्किलें आयेंगी, इसलिए उसके मामा उसके लिए एक मुसलमान लड़के का रिश्ता लाते हैं लेकिन रानी का भी अपना एक रहस्य है जिसे उसने सबसे छुपाया है .. कहानी के अंत का सरप्राइज़ अच्छा है। कहानी में माँ और पिता के धर्मों की बात नहीं की है, कि क्या उनमें से किसी ने धर्म बदला था या नहीं, पर शायद उस बात को जोड़ने से कहानी की सरंचना थोड़ी जटिल बन जाती। 

सम्मुख में दो सौ शब्दों की कुछ लघु-कथाएँ पढ़ीं - कुछ कहानियाँ अच्छी लगीं जैसे कि बेजी जैसन की कहानी "भरम", अंजू शर्मा की "जीत", हरि मृदुल का "रोना", लकी राजीव की "अनायक", आदित्य शुक्ल की कहानी "पंख", और, आकांक्षा पारे काशिव की "न्यौता"। कुछ अन्य कहानियों में लगा कि उनका मूल विचार अच्छा था, लेकिन कथा-संरचना को थोड़ा और असरदार किया जा सकता था, जैसे कि , अनिर्बाण साधु का "रंग धनुष", देवेश पथ की "तुर्किश आइसक्रीम", उषा कुमारी की "वायरल विकास", और पल्लवी विनोद की "फोटोग्राफर"। खैर, अभी सभी लघु-कथाएँ नहीं पढ़ पाया हूँ।

कथाक्रम के सितम्बर 2026 अंक में गोविंद मिश्र की कहानी "काम ... मुझे भी" में वृद्ध सज्जन हैं जो अकेले रहते हैं पर बुढ़ापे के साथ तकलीफें बढ़ी हैं इसलिए किसी सहायक को खोज रहे हैं और एक एजैंसी से बात करते हैं। लेकिन शुरु में जितने युवक रखते हैं उनके साथ अनुभव अच्छा नहीं होता, जब एजैंसी वाला एक ऐसे युवक की बात करता है जिसका पारिवारिक इतिहास संदेहनीय है .. छोटी सी कहानी में कोई नाटकीय मोड़ नहीं हैं, बस विश्वास बनने की बात है। यह कहानी आज की दुनिया में अकेले वृद्धों की बढ़ती संख्या और नवयुवकों को नौकरी मिलने की दिक्कतें, इन दोनों समस्याओं को जोड़ती है।

संवेद पत्रिका के जनवरी 2026 अंक में दिव्या विजय की कहानी "कृष्ण पंखुरी" की कहानी सुरमा की है जिसकी बस्ती में सब लड़कियाँ घरों में बाथरूम साफ करने जाती हैं और सुरमा को एक मॉल के बाथरूम की सफाई की नौकरी मिलती है। आसपास सब काम करने वाली लड़कियों को ईर्श्या है कि सुरमा इतनी अच्छी जगह पर इज़्जतदार नौकरी करती है, लेकिन दिक्कत यह है कि जब मॉल में आने वाली लड़कियों की तरह, सफाईवाली के कपड़े-बाल छोड़ कर मॉल वाली लड़कियों के फैशन करने की कोशिश करती है तो उसके पास उनके क्रूर शब्दों से लड़ने के लिए साहस नहीं है, वह हार मान लेती है। पर, कुछ महीने बाद, उसे भी उनमें से एक युवती से बदला लेने का मौका मिलता है तो ... कहानी में अपने आत्मसम्मान के लिए लड़ने की कमज़ोरी का चित्रण अच्छा लगा।

तद्भव में मृत्युंजय कुमार सिंह की कहानी "जल्लाद उर्फ हैंगमैंन" में जेल के पुराने फांसी लगाने वाले बाबुल मसीह हैं, उनकी पत्नी बिल्किस है, उनका बेटा अब्दुल्ला है और जेल का कैदी तारक सकुल है। तारक ने लोगों की हत्या की है और जिस दिन तारक को फांसी लगने वाली है, उस दिन बाबुल मसीह उसे फांसी पर लटकाने वाली रस्सी को तैयार करते हुए उससे बातें करते हैं। छोटी सी कहानी में एक छोटी सी बात है, लेकिन मृत्युंजय जी की काबलियत है कि उस कहानी को ऐसे रचते हैं कि अंत तक बांधे रखती है।  

हिंदी कविता 

मुझे कविताएँ कम ही अच्छी लगती हैं, मैं अंग्रेज़ी और इतालवी में कविताएँ बिल्कुल नहीं पढ़ पाता, पढ़ूँ तो उनमें सौंदर्यबोध या भावबोध नहीं होता। हिंदी कविताओं में भी मुझे पुराने कवि ही अच्छे लगते हैं, नयी कविता मुझे प्रभावित नहीं करती। लेकिन आज के इस आलेख में दो आधुनिक कवि भी हैं - विनय सौरभ और दिनेश शुक्ल। 

अकार पत्रिका में  विनय सौरभ की कविताओं में छोटी-छोटी बातों में छिपी हुई लम्बी कहानियाँ हैं। "असंभावित के विरुद्ध" की कहानी में घर से भागी हुई एक लड़की है, और उसके सालों बाद अपने गाँव में लौटने की बात है। "माँ के शाल" में माँ और मौसी के सम्बंधों का रस है।

सौरभ जी की "अपने ही स्टेशन से गुज़रना" में छूटे हुए गाँव की यादों की बात है, उनकी कविताओं में मुझे यह कविता-कहानी सबसे अधिक अच्छी लगी - इसकी पहली पंक्तियाँ हैं, "एक रोज यात्री बन कर गुजरते हो/ अपने ही गाँव के स्टेशन से/ एक उदासी भीतर फैल जाती है अचानक/  खिड़की से बाहर तलाशते हो, कोई चेहरा दिख जाये परिचित/"।  उनकी एक अन्य कविता, "वे ही!" में अपने आप से प्रश्न हैं कि हम लोगों के सुख-दुख में, उनकी मृत्यु आदि पर क्यों नहीं हिस्सा ले पाते। इसकी कुछ पंक्तियाँ हैं - "यह ख्याल आता है अक्सर देर रात गये/ या आधी नीँद के बीच/ जैसे कोई पत्थर आज भी सीने में लुढ़कता रहता है/ आत्मग्लानी का भार लिए/"। 

ककसाड़ के अगस्त अंक में मुझे दिनेश शुक्ल की दो गज़लें पसंद आयीं। उनकी पहली गज़ल की यह पंक्तियाँ देखिये: "यह चादर वक्त की जर्जर हवा से थरथराती है/ गरीबी पर लगी तुरपाइयाँ रह-रह उधड़ती हैं/" और "दुखी सपनों के किस्से, रात की टूटी हुई नींदें/ सुबह परछाईयाँ इक सीढ़ियाँ चढ़ती उतरती हैं/"।

और उनकी दूसरी गज़ल की पहली पंक्तियाँ भी मुझे बहुत अच्छी लगीं: "किस्सा मत पूछिये, टूटी हुई थकानों का, इसके आगे है सफर, रेत के मकानों का।"

अंत में 

आज के इस आलेख के अंत में तद्भव से आकांक्षा बरनवाल के आलेख से कुछ अन्य पंक्तियां जो मुझे विचारनीय लगीं: "जिस प्रकार 19वीं सदी के सुधारकों ने 'पौरुषहीन (effeminate) कहलाने के डर से अपने धर्म को 'कठोर' और 'एकेश्वर वादी' बनाने का प्रयास किया था, वैसा ही आज की राजनीति इतिहास-2 (लोक परंपरा और मिथक) को जबरन इतिहास-1 (तथ्यात्मक इतिहास) बनाने पर तुली है। दीपेश चर्कवर्ती कहते हैं कि गाँधी ने इतिहास-2 (लोक परंपरा, मिथक और भावनाओं) की भाषा बोली। जब गांधी ने रामराज्य कहा तो उसका मतलब किसी ऐतिहासिक समय या राजा की वापसी नहीं बल्कि राज्य की ऐसी परिकल्पना देना था जिसे किसान भी समझता था। जब गांधी ने नमक उठाया या चरखा चलाया, तो वह कोई आर्थिक सिद्धांत देने से अधिक भारत की आत्मा को छूना चाहते थे। ... आज के नेता इतिहास-1 की भाषा बोलते हैं। यहां तक कि जब वे धर्म की बात भी करते हैं तो उसे 'वैज्ञानिक' सिद्ध करने में लगे रहते हैं ...लेकिन दोनों ही स्थितियों में वह पश्चिमी इतिहासबोध की ही नकल कर रहे हैं। यह सांस्कृतिक युद्ध तब तक शांत नहीं होगा जब तक हम गांधी की या जे. कृष्णमूर्ति की भांति उस हीन भावना से मुक्त नहीं हो जाते, जो हमें हर क्षण पश्चिम के समक्ष खुद को सही और ऐतिहासिक सिद्ध करने के लिए विवश करती है।" 

इस बार जो पढ़ा उसमें मुझे आकांक्षा बरनवाल के आलेख के अतिरिक्त हँस पत्रिका का आदिवासी जीवन और साहित्य पर केन्द्रित अंक सबसे अधिक रोचक लगा। 

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बुधवार, अगस्त 19, 2026

ब्लॉग या सबस्टैक

हिंदी के पहले ब्लॉग 2004-05 के आसपास बनने शुरु हुए थे। मैंने यह अपना ब्लॉग 2005 में गूगल के ब्लॉगर पर बनाया था। पिछले इक्कीस सालों में अपनी बात को लोगों तक पहुँचाने वाले माध्यमों में बहुत से परिवर्तन आये हैं। गूगल के अतिरिक्त, ब्लॉग बनाने के अन्य बहुत से प्लेटफॉर्म आये और गये, उनमें से कुछ जैसे कि वर्डप्रैस आज भी जीवित हैं। लेकिन स्थिति बदलती रहती है, जब भी फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम जैसे नये प्लेटफॉर्म निकलते हैं तो कुछ ब्लॉग लिखने वाले उन पर लिखने लगते हैं और अपने पुराने ब्लॉगों को बंद कर देते हैं, कुछ साथ-साथ ब्लाग को भी चालू रखते हैं।

कुछ वर्ष पहले सबस्टैक नाम का एक नया प्लेटफॉर्म निकला तो बहुत से ब्लॉग वहाँ चले गये हैं। कुछ दिन पहले किसी ने मेरी राय पूछी कि सामान्य ब्लॉग बनाना चाहिये या सबस्टैक वाला ब्लॉग, तो मैंने इस विषय पर सोचा। साथ में इस बात पर भी विचार किया कि इक्कीस साल के बाद भी मैं इस ब्लॉग पर क्यों लिखता रहता हूँ?

इस आलेख में ब्लॉग बनाम सबस्टैक, और आज की दुनिया में जब अपनी बात लोगों तक पहुँचाने के लिए इतने सारे माध्यम है, ब्लॉग लिखने का महत्व, जैसी बातों के बारे में अपनी सोच और अनुभव साझा करना चाहता हूँ।

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सबस्टैक के पाठकों के लिए दो चेहरे हैं - उसका प्रमुख चेहरा है इलैक्ट्रोनिक न्यूजलैटर का, यानि अगर आप किसी सबस्टैक के सदस्य बनेंगे तो उसके आलेख आप के ईमेल से आप तक पहुँचेंगे। उसका दूसरा चेहरा है कि आप उन्हीं आलेखों को ब्लॉग की तरह भी इंटरनैट पर या सबस्टैक एप्प पर पढ़ सकते हैं।

सबस्टैक के लेखक अपने पाठकों से अपने आलेखों को पढ़ने के लिए फीस माँग सकते हैं, आप से कह सकते हैं कि आप उनके सदस्य बनिये और अगर फीस दे कर आप सदस्य नहीं बनते तो उनके आलेखों को नहीं पढ़ सकते।

सबस्टैक 2017-18 के आसपास बनने शुरु हुए थे। गूगल से पूछा तो पता चला कि दुनिया में इस समय करीब एक लाख सबस्टैक लेखक हैं जो नियमित लिखते हैं और उन्हें पढ़ने के लिए पैसे दे कर सदस्य बनना आवश्यक है। उनके अतिरिक्त अन्य कई लाख फ्री सबस्टैक हैं, जिन्हें पढ़ने की कोई फीस नहीं लगती।

भारत से निकलने वाले लोकप्रिय सबस्टैक हैं रोहण वैंकट का इंडिया इनसाईड-आऊट, प्रणय कोटास्थाने का एन्टीसिपेटिन्ग द अनइनटैंडिड, महिमा वशिष्ठ का वूमैंनिन्ग इन इंडिया, द वायर का इंडिया केबल और श्रेयास शैंदे का इंडियालॉग।

जहाँ तक मुझे मालूम है अभी तक दुनिया मे हिंदी में कोई सबस्टैक नहीं चल रहा है। सदस्यता वाले सबस्टैक भारत में रह कर चलाना कठिन है क्योंकि उसके पैसे केवल स्ट्राईप पैयमैंट सिस्टम से मिलते हैं जिससे जुड़ने के लिए भारत में आप को रजिस्टर्ड बिज़नैस होना आवश्यक है, इसलिए आम व्यक्ति जो अपना व्यक्तिगत सबस्टैक बनाना चाहते हैं वह उसके माध्यम से कमा नहीं सकते। मैंने कुछ भारतीय सबस्टैक में देखा है कि वह आप से सदस्यता नहीं माँगते, लेकिन आलेखों के अंत में लिंक डाल देते हैं "हमारी सहायता कीजिये और हमे चाय या कॉफी पिलाईये" और वहाँ आप से पैसे देने के लिए कहते हैं। ऐसी ही एक लिंक पर क्लिक किया तो उन्होंने मुझसे कॉफी के लिए 5 यूरो यानि पाँच सौ रुपये देने के लिए कहा।

यूरोप के कुछ लोकप्रिय सबस्टैकों के कुछ उदाहरण हैं - तकनीकी के बारे में हॉलैंड से "द प्रेगमैटिक इंजीनियर" जिसके लाखों सदस्य हैं, साँस्कृतिक विषय पर इटली से "वाले तूत्तो" जिसके ढाई लाख सदस्य हैं, मैनेजमैंट के बारे में इटली से "रिफैक्टरिन्ग" जिसके डेढ़ लाख सदस्य हैं, और फाईनैन्स के विषय पर इंग्लैंड से "नेट इंडरस्ट"।

अमरीका के कुछ लोकप्रिय सबस्टैकों के उदाहरण हैं - अमरीकी राजनीति पर "लैटर्स फ्रोम एन अमेरिकन" और "द बुलवार्क", समाचारों पर "द फ्री प्रैस", नीतियों और आर्थिक विषयों पर "स्लो बोरिन्ग", और समाचारों पर व्यंग करने वाला, "द बोरोविट्ज़ रिपोर्ट"।

ब्लॉग या सबस्टैक पर लिखने के फायदे

मेरे विचार में इनका सबसे बड़ा फायदा है कि दुनिया के किसी भी कोने में लोग आप को पढ़ सकते हैं।

दूसरा फायदा है कि यह बने-बनाये प्लेटफॉर्म हैं, इसमें फॉन्ट, लेआऊट, तस्वीर लगाना आदि बहुत आसान है, इसे आप एक दिन में बिना किसी की सहायता के सीख सकते हैं।

इसका तीसरा फायदा है कि जब तक वह प्लेटफॉर्म रहेगा, आप का लिखा सुरक्षित है, जैसे कि मैं अपने बीस साल पहले लिखे आलेखों को आसानी से देख-खोज सकता हूँ, अगर उनमें कुछ नया जोड़ना चाहूँ या बदलना चाहूँ तो वह सब कर सकता हूँ। चूँकि कम्पनियाँ फेल हो जाती हैं, उनके प्लेटफॉर्म कभी भी बंद हो सकते हैं, इसलिए आप अपने ब्लॉग के आरकाइव को डाउनलोड करके उसकी एक कॉपी अपने पास सम्भाल कर भी रख सकते हैं।

इसका चौथा फायदा है कि आप अपने पाठकों की टिप्पणियाँ तुरंत देख सकते हैं और उनसे विचारों का आदान-प्रदान भी कर सकते हैं। एक ज़माने में लोग कम्प्यूटर से अधिक पढ़ते थे, तब टिप्पणियाँ अधिक मिलती थीं, आजकल लोग ट्रेन या बस में बैठे-बैठे मोबाइल पर ब्लॉग पढ़ते हैं इसलिए टिप्पणियाँ मिलना बहुत कम हो गया है।

ब्लॉगर पर बहुत सी एप्प हैं जिनकी सहायता से आप आसानी से जान सकते हैं कि कितने लोगों ने आप का आलेख पढ़ा है, वह कौन से देशों से हैं, महीने में कितने लोग आप के ब्लॉग को पढ़ते हैं। जैसे कि मेरे इस ब्लॉग को आजकल हर महीने बारह-पंद्रह हज़ार लोग पढ़ते हैं, इसके कुछ आलेख बहुत लोकप्रिय हैं, उन्हें बीस-पच्चीस हज़ार लोग पढ़ चुके हैं।

अगर आप चाहें तो ब्लॉग से कमा भी सकते हैं। ब्लॉगर आप को गूगल-एड डालने का मौका देता है, अन्य प्लेटफॉर्म वाले यह मौका नहीं देते लेकिन आप खुद अपने स्पॉन्सर या विज्ञापन खोज सकते हैं। जिन्होंने गूगल विज्ञापनों से कमाने की कोशिश की है, वह कहते हैं कि यह आसान नहीं है और कई बार गूगल अपने विज्ञापकों की वजह से आप से अपने लिखे को बदलने या हटाने के लिए कह सकता है। लेकिन गूगल-एड में कोई जबरदस्ती नहीं है, मैं ब्लॉग से कमाना नहीं चाहता, इसलिए मैं इसमें कोई व्यवसायिक आलेख या विज्ञापन नहीं स्वीकारता।

हो सकता है कि अपने ब्लॉग पर भी आप "मुझे चाय पिलाईये" जैसी लिंक डाल सकते हैं जिसके लिए आप यू.पी.आई. के किसी सिस्टम से पाठकों से कुछ पैसे देने के लिए कह सकते हैं। मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं है, न ही मैं जानता हूँ कि यह भारतीय कानून के हिसाब से कानूनी है या नहीं। इसे करने से पहले वकील आदि से सलाह लीजिये।

मेरा अनुभव है कि ब्लॉग या सबस्टैक से पैसा कमाना कठिन है। कुछ प्रसिद्ध सबस्टैक जिनके नाम ऊपर दिये हैं वह लाखों डालर कमाते हैं लेकिन वहाँ हम लाखों में से एक की बात कर रहे हैं, वह भी उसकी जो किसी क्षेत्र में बहुत ज्ञान रखता है और बहुत मेहनत करता है, हर हफ्ते नयी जानकारी ले कर आ रहा है।   

ब्लॉग और सबस्टैक में अंतर

कुछ अंतरों के बारे में ऊपर बात हुई है, जैसे कि ब्लॉग को उसकी वेबसाइट पर पढ़ते हैं जबकि सबस्टैक आप की ईमेल में न्यूजलैटर की तरह से आ सकता है। 

एक अन्य बड़ा अंतर है कि सबस्टैक का ले-आऊट (शब्द संयोजन) बदला नहीं जा सकता, जबकि ब्लॉग में आप रंग, तस्वीरें, ले-आऊट आदि सरलता से बदल सकते हैं।

ब्लॉगर बिल्कुल फ्री होता है, आप जितने चाहें, अलग-अलग भाषाओं में ब्लॉग बना सकते हैं। जबकि सबस्टैक में अगर आप सदस्यता की फीस नहीं लेते तो वह भी फ्री है, लेकिन अगर आप सदस्यता फीस लेते हैं तो आप को उसकी कमीशन देनी होती है। बाकी ब्लॉग प्लेटफॉर्म, जैसे कि स्कावयरस्पेस, को वार्षिक फीस देनी पड़ती है।

ब्लॉगर और सबस्टैक दोनों पर आप के आलेखों को, पाठक अपनी भाषा में अनुवादित देख और पढ़ सकते हैं। यानि आप के हिंदी ब्लॉग को फ्राँसिसी या स्पैनिश बोलने वाले भी पढ़ सकते हैं।

अगर आप ऐसे विषयों के बारे में लिखेंगे जिसके बारे में दुनिया जानना चाहती है तो लोग आप को किसी भी भाषा में पढ़ेंगे। पर अधिक पाठक खोजना जरूरी नहीं है, अगर ब्लॉग आप की आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम है, तो कौन-कितने वाली बातें भूल जाईये, जिसमें आप के मन को संतोष मिलता है, वह लिखिये। मेरी अपनी सोच यही रही है।

ब्लॉगर गूगल का है, अगर एक बार गूगल को विश्वास हो जाये कि आप बिना कहीं से नकल किये, अपनी जानकारी से और अच्छी भाषा में अच्छी तरह से लिखते हैं, तो वह पाठकों को आप के ब्लॉग में भेजता है, जबकि सबस्टैक को यह मदद नहीं मिलती। ब्लॉग और सबस्टैक, दोनों फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि की सहायता से भी अपने पाठक खोज सकते हैं।   

अंत में

हिंदी ब्लॉग जगत को जानने और पढ़ने के लिए आप पाँच लिंको का आनन्द, हिंदी ब्लाग जगत, ब्लाग4वार्ता, ब्लोगोदय, जैसे ब्लॉग प्लेटफार्म से तरह-तरह के हिंदी ब्लॉगों को देख सकते हैं। 

दस-पंद्रह साल पहले तक हिंदी के हज़ारों ब्लॉग होते थे, आज उनकी संख्या बहुत कम हो गयी है, बहुत से लोग अन्य सोशल मीडिया, विशेषकर फेसबुक के माध्यम से अपने लेखन को दूसरो तक पहुँचाते हैं। फेसबुक पर "हिंदी ब्लाग" खोजेंगे तो वहाँ ऐसे पन्ने मिलेंगे जहाँ पर आप अपने हिंदी लेखन के बारे में समाचार या विज्ञापन दे सकते हैं। 

मेरे लिए मेरा ब्लॉग मेरी डायरी है, मैं इसे सबसे पहले अपने संतोष के लिए लिखता हूँ। पहले के मुकाबले में आजकल पाठकों की टिप्पणियाँ मिलना बहुत कम हो गया है, लेकिन मैं देख सकता हूँ कि हर रोज़ पाँच सौ से ले कर एक हज़ार लोग इस ब्लॉग पर कुछ न कुछ पढ़ने आते हैं, मेरे लिए यही संतोष की बात है। कुछ महीने पहले मैंने अपने नये फैंतासी उपन्यास को भी अपने ब्लॉग से प्रकाशित किया है, इस तरह मुझे नये प्रयोग करना अच्छा लगता है।

अगर आप के मन में लिखने की और आत्म-अभिव्यक्ति की इच्छा है तो मेरी राय है कि अपना ब्लॉग बनाईये, इसके लिए आप को किसी अन्य पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा। आप के पास कम्प्यूटर या लेपटाप हो तो यह आसान होगा, मोबाइल से ब्लॉग लिखने में शायद कुछ मुश्किलें हों। एक बार लेखन का अभ्यास बढ़ेगा तो कल आप पत्रिकाओं और प्रकाशकों के लिए भी लिख सकते हैं।

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रविवार, अगस्त 09, 2026

क्या पढ़ा (1) - हिंदी कहानियाँ-आलेख

लगभग पिछले चालिस सालों से, जबसे दिल्ली छोड़ कर इटली में रहने लगा था, मेरा हिंदी पत्रिकाएँ पढ़ना बहुत कम हो गया था, जब भारत जाता था तो इक्का-दुक्का पढ़ लेता था। पिछले साल अगस्त में मैंने "नॉटनुल" की वार्षिक सदस्यता ली तो इतने सालों के बाद हिंदी की पत्रिकाएँ पढ़ने का मौका मिलने लगा। अब इस बात को करीब एक साल हो गया है, एक दिन मैं याद करने लगा कि पिछले बारह महीनों में हिंदी पत्रिकाओं में क्या अच्छा पढ़ा, तो कुछ भी याद नहीं कर पाया। तब सोचा कि आगे से मुझे जो पढ़ा हुआ अच्छा लगेगा, उसके बारे में इस ब्लॉग पर लिखने की कोशिश करनी चाहिये, ताकि ज़रूरत पड़ने पर उसे याद किया जा सके।

 

मुझे आशावादी साहित्य पढ़ना अच्छा लगता है, मैं चाहता हूँ कि चाहे कितनी भी बड़ी मुश्किलें या दुख हों, लेकिन कहानी के क्षितिज पर एक आशा की छोटी सी किरण भी होनी चाहिये, सब कुछ बिल्कुल नकारात्मक नहीं होना चाहिये। दूसरी बात है कहानी का कथानक, उसके कहने का अन्दाज़, उसकी बातें। पिछले वर्ष में जब हिंदी पत्रिकाएँ पढ़ीं तो मुझे समझ में आया कि मुझे हिंदी कहानियाँ पढ़ना इतना अच्छा नहीं लगता, बल्कि आलेख पढ़ना अधिक अच्छा लगता है।

इसीलिए आज के मेरे इस आलेख में कहानियाँ कम पायेंगे और आलेख अधिक।

कथा-कहानियाँ 

चंद्रकिशोर जायसवाल की कहानी "फर्ज", नया ज्ञानोदय पत्रिका के जुलाई अंक में पढ़ी। इसमें दामोदर भगत का बेटा बैजनाथ अपनी पसंद की युवती से ब्याह करना चाहता है, पर भगत जी ने पाँच साल पहले किसी को ज़ुबान दी थी कि उनकी सुंदर, सुस्कृंत कन्या से पुत्र का ब्याह करेंगे। गुस्से में भगत जी निर्णय लेते हैं कि अगर बैजनाथ उनकी बात नहीं मानेगा तो वह उसे अपनी जयदाद से बेदखल कर देंगे। कह तो देते हैं लेकिन उनके मन में इस बारे में कुछ संशय है, इसलिए वह अपने फुलकाहा गाँव के वरिष्ठ ज्ञानी वेदानन्द गिरि से सलाह लेने जाते हैं ... जब यह कहानी शुरु हुई, तो मेरे मन में अपेक्षा थी कि वह किस दिशा में जायेगी, लेकिन कहानी ने वह घिसा-पिटा रास्ता नहीं लेती, बल्कि एक दूसरी ही दिशा में चल पड़ती है। कहानी में वेदानन्द बाबू की यादों के किस्से और उनकी भगत जी को समझाने की कोशिशें, मुझे अच्छी लगीं। कहानी का अंत थोड़ा सा कन्वीनियंट लगा, पर कहानी पढ़ने में मज़ा आया।

मुकेश नौटियाल की कहानी "सियारसिंगी", जुलाई 2026 की पाखी पत्रिका में पढ़ी। इस कहानी में दो कहानियाँ हैं, एक कहानी है एक पहाड़ी गाँव की औरत, उसके बेटे और उसके खोये हुए भाई की। और दूसरी कहानी है एक तिब्बती शरणार्थी युवती और उसके साथ रहने वाले गूँगे-बहरे लड़के की। इन दो कहानियों को स्कूल में पढ़ाने वाले एक मास्टर जी जोड़ते हैं जो गाँव वाली औरत की चिट्ठियाँ लिखते हैं और उसके भाई को खोजने देहरादून की तिब्बती बस्ती में जाते हैं। कहानी में दो लोकविश्वास की कहानियाँ भी जुड़ी हैं, एक सियारों के माथे में उगने वाली जादुई शक्ति वाली सियारसिंगी की और दूसरी, इन्सानों को आग पर पका कर उनके कपाल से निकाले जाने वाले रामतेल की। यह सारी कहानी संयोगों पर टिकी है, कहानी के हर मोड़ पर मास्टर जी हर जगह पर जो भी खोजते हैं, वह उन्हें आसानी से मिल जाता है। पर जादुई-यदार्थवाद की कहानी में तर्क की अपेक्षा करना शायद उचित भी नहीं है। इस कहानी में मुझे उसकी भाषा और पहाड़ी लोकजीवन की खुशबु अच्छी लगीं। 

नर्मदेश्वर की कहानी "सूई धागा", परिकथा पत्रिका के जुलाई अंक में पढ़ी, अच्छी लगी। छोटी सी, सीधी-साधी कहानी है, जद्दी चाचा नाम के दर्जी और संदीप नाम के लड़के की, कि कैसे समय के साथ संदीप की उनसे जान-पहचान बनती है और लड़के को समझ आती है कि ऊपर से सख्त दिखने वाले जद्दी चाचा मन के नर्मदिल हैं। कहानी में जद्दी चाचा का अपने बेटों के नाम पेट्रोल और डीज़ल देख कर कुछ अजीब सा लगा, सोचा कि लेखक को उन नामों की कहानी भी बतानी चाहिये थी। इस कहानी से मुझे बचपन के दिनों की याद आई जब दर्जी, सफाई वाले, कपड़े इस्तरी करने वाले, दुकानदार, आदि बेनाम नहीं सचमुच के लोग होते थे, हम उनके नामों और परिवारों के इतिहासों को जानते थे, और वे हमारे।

आलेख, संस्मरण, आदि 

बिपिन तिवारी, अभिषेख गुप्ता और रोहतास कुमार का सुधीर विद्यार्थी से लम्बा साक्षात्कार "विप्लव राग" शीर्षक से, बनास जन पत्रिका में पढ़ा जो मुझे अच्छा लगा। सुधीर विद्यार्थी जी 1953 में पैदा हुए थे, उन्होंने इतिहास में एमए की और बीसवीं सदी के क्राँतिकारियों के बारे में बहुत कुछ लिखा है। इस साक्षत्कार-आलेख में बहुत सी रोचक बातें जानने को मिली, जैसे कि बनारसीदास चतुर्वेदी, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ, सुंदरलाल, बाबा नागार्जुन, आदि के संस्मरण, क्राँतिकारियों के बारे में गाँधी जी और नेहरू जी के बीच मतभेद, लोगों द्वारा भगतसिंह के सिर पर पगड़ी रखने का अर्थ, पंडित परमानन्द की कहानी, सुनीति चौधरी और शांति घोष की बातें, आदि। आलेख में अपने लेखन के बारे में सुधीर जी कहते हैं, "मैं किसी लायब्रेरी में नहीं बैठा, न किसी आर्काइव में गया। उस इतिहास को मैंने देखा-सुना-जाना, क्राँतिकारियों की आँखों से, उनके शब्दों से। इतिहास को बताते हुए कई-कई बार उन्हें रोते हुए देखा ..."। 64 पन्नों का यह साक्षात्कार है, किसी छोटी किताब के बराबर लम्बा है, पर बहुत दिलचस्प है। 

प्रसिद्ध शायर बशीर बद्र का मई 2026 में 91 वर्ष की आयु में निधन हुआ। उनके बारे में दो आलेख पढ़े। एक आलेख "हँस पत्रिका" में पढ़ा जिसमें युवा शायर महेंद्र कुमार सानी ने अपने स्मृति-आलेख, "उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो", में उनके प्रिय और प्रसिद्ध शेरों को याद किया है। जबकि डॉ. जियाउर रहमान ज़ाफ़री ने "ककसाड़ पत्रिका" के जुलाई अंक में अपने आलेख, "शायर बशीर बद्र को याद करने वाले ...", में उनके जीवन की कुछ बातों बतायीं हैं जैसे कि कैसे 1987 में मेरठ के दंगे में अपना घर खो कर वह भोपाल चले आये थे, कैसे अंतिम वर्षों में उनकी यादाश्त नहीं रही थी और कैसे बड़े बाग कब्रिस्तान में उनके जनाज़े साथ केवल मोबाइल की रोशनी और थोड़े से लोग थे। यहाँ मैं बद्र साहब का वह शेर याद करना चाहूँगा जिसे मैंने अपना जीवन जीने का मंत्र बनाया है: "हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ़ भी चल देंगे, रास्ता हो जायेगा।" 

शिव कुमार पाण्डेय का आलेख, "बस्तर की बोली-भाषा", भी ककसाड़ पत्रिका में ही पढ़ा। मुझे जनजातियों के जीवन से जुड़े लेख पढ़ना अच्छा लगता है इसलिए "ककसाड़" मासिक पत्रिका हमेशा चाव से पढ़ता हूँ। इस आलेख में पाण्डेय जी ने बस्तर की भाषाओं और बोलियों का बहुत दिलचस्प विवरण दिया है। जैसे कि गोंडी भाषा बस्तर में कांकेर और भानुप्रतापपुर के साथ-साथ अन्य बहुत से क्षेत्रों में भी बोली जाती है जिनमें कोन्टा, भोपाल पटनम, दाँतेवाड़ा, गढ़चिरोली, बालाधार, आदि भी शामिल हैं। हर जगह की गोंडी थोड़ी सी भिन्न है, लोग एक-दूसरे की गोंडी को समझते हैं, लेकिन उत्तर अपनी गोंडी में देते हैं। गोंडी के अतिरिक्त इस आलेख में "हल्बी" भाषा का भी जिक्र है जिसे बस्तर की सम्पर्क की भाषा भी कह सकते हैं और जिसमें छत्तीगढ़िया, मराठी और उड़िया भाषाएँ मिली हुई हैं। लेकिन गोंडी, हल्बी और बस्तर की अन्य 36 बोलियों में आपस में क्या सम्बंध है, यह बात मुझे ठीक से समझ नहीं आई, इसलिए इस विषय पर और पढ़ना अच्छा लगेगा। 

अकार पत्रिका में प्रियंवद का सम्पादकीय पढ़ा जिसमें उन्होंने हिंदी के वरिष्ठ लेखक तथा पहल पत्रिका के सम्पादक ज्ञानरंजन जी के बारे में लिखा है वह अच्छा लगा। उसमें उन्होंने, अन्य लेखकों के ज्ञानरंजन जी को लिखे पत्रों के माध्यम से, उनकी मार्क्सवादी-कथाकार बनने की यात्रा और फ़िर उनका कथाकार से अधिक सम्पादक बन जाने की बात, अन्य लेखकों के साथ उनके सम्बंधों, आदि की बातें बतायी हैं। ज्ञानरंजन जी की यह बात कि "मैं अपनों के प्रति बहुत निर्मम हूँ", मुझे बहुत परिचित सी लगी, क्योंकि एक समय था जब मेरी सोच भी कुछ वैसी ही थी, मुझे भी यह लगता था कि अगर मैं आप की कड़वी आलोचना करता हूँ तो इसका मतलब है कि आप मेरे प्रिय हैं (अब मैं इस सोच से बचने की कोशिश करता हूँ)। ज्ञानरंजन जी का इस साल के प्रारम्भ में देहांत हो गया था।

अकार पत्रिका के 73 अंक में ही "मेरी रचनात्मकता: मेरे द्वंद" शीर्षक से विभिन्न लेखकों के वक्तव्य छपे हैं, इन्हें भी मैंने बहुत रुचि से पढ़ा और यह मुझे बहुत अच्छे लगे। इनमें से कुछ की बात करना चाहता हूँ, जिन्होंने मुझे गहरा छुआ:

मनोज रूपड़ा के वक्तव्य में, उनकी स्मृतियों में हिंसा की घटनाओं, कुत्तों का घायल बिल्ली को नोच कर खाने से ले कर जलती रेल की बोगी में झुलसती लाशों के विवरणों, ने दिल को हिला दिया।

जया जादवानी की जीवन गाथा पढ़ी तो लगा कि उनके जैसा जीवन जीते हुए पढ़ना और लिखना का मतलब कितनी कठिनाईयों से लड़ना है। वह लिखती हैं, "द्वंद कुछ नया सोचने का, कुछ नया रचने का अब ज़्यादा है। कुछ ऐसा जो वर्जित हो, जिसे अब तक कहा न जा सका हो। कहा भी गया हो तो उसके भीतर घुस कर नहीं। मैं चाहती हूँ मेरा सत्य मेरे होने से निकले ..."

जितेन्द्र भाटिया के वक्तव्य में उनका कहानी लिखने को वैताल के वृक्ष से "स्मृति के शव को नीचे उतारने जैसा" पढ़ कर बहुत देर तक सोचता रहा। मुझे लगा कि शायद स्मृतियाँ शव नहीं होतीं, जीवित होती हैं पर उनमें एक अलग किस्म का जीवन होता है। जैसे विक्रम के गलत उत्तर देने पर वह शव उड़ कर वापस पेड़ पर लौट जाता है, वैसे ही स्मृतियाँ भी हमारे मानसिक पटल पर उड़ती-घूमती रहती हैं। उनकी एक अन्य बात कि "कविता के मुकाबले में गद्य लेखन, प्रेरणा से अधिक एक धैर्यपूर्ण रियाज़ और अपने आगे-पीछे देखने-समझने की विवेकपूर्ण मशक्कत माँगता है", ने भी सोचने पर मजबूर किया।

दिव्या विजय की बात कि व्यक्ति अपने आप को लेखक कब महसूस करता है, मुझे दिलचस्प लगी। मैं अक्सर कला प्रदर्शनियों में कलाकारों से साक्षत्कार करता हूँ, वहाँ भी अक्सर उनके मन में यही संशय मिलता है, कि शायद मैं कलाकार नहीं हूँ, मैंने कला के लिए बलिदान वाला जीवन नहीं जिया। दिव्या जी लिखती हैं, "लिख देना, छप जाना, क्या इतने भर से लेखक बना जा सकता है? वह क्या है जो किसी व्यक्ति को लेखक में बदल देता है?"

राही डूमरचीर के वक्तव्य में संताल गाँव और मित्रों के बीच में एक प्रवासी परिवार का हिस्सा होने का द्वंद है, जो संतालों को नीचा और पिछड़ा हुआ मानता है, उनसे सम्बंध नहीं रखना चाहता, वहाँ की प्रकृति-पहाड़ की सुंदरता को नहीं देख पाता। वह लिखते हैं, "... दंभ भी आनुवांशिक होता है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्वत: हस्तांतरित होता रहता है ... आदिवासियों के प्रति हमदर्दी ही हिलोर मारती थी, प्यार नहीं कर पाता था ... जँगल में अराजकता का राज होता है, कोई कायदा, कानून नहीं होता, यह वही कह सकता है जिसे सिर्फ बगीचे वाली व्यवस्था नज़र आती है ...हमारा समय पुरखे, पेड़ों, जंगलों में निवास करता है। उनके बीच पलता-बढ़ता है। उन्हीं के साथ-साथ चलता है। उनके बीतने से हमारा समय भी बीत जाता है ... मनुष्य विरोधी हो कर तो फ़िर भी रहा जा सकता है, पर धरती विरोधी हो कर कितने दिनों तक बचे रह पायेंगे हम?" 

कथा क्रम पत्रिका के अप्रैल-जून अंक में मधुरेश जी का लम्बा आलेख "शरत चन्द्र और उनका 'शेष प्रश्न': प्रेम दृष्टि और स्त्री चिंता के सवाल" में शरत चन्द्र के उपन्यास "शेष प्रश्न" के विभिन्न पात्रों विशेषकर कमल के बारे में, विवेचना तो है ही, साथ ही इस उपन्यास के विभिन्न संस्करणों के अनुवादों की गुणवत्ता और साहित्यिक भिन्नताओं की बात भी है। इस सब के साथ, आलेख में हिंदी साहित्य के पुराने अनुवादकों और प्रकाशकों की बाते भी हैं जो मुझे बहुत दिलचस्प लगीं। उदाहरण के लिए इस उपन्यास के 1927 में निकले संस्करण जिसका अनुवाद धन्य कुमार जैन ने किया था और नाथूराम 'प्रेमी' ने प्रकाशित किया था, की बात करते हुए वह नाथूराम प्रेमी के बारे में वह पुरानी जानकारी देते हैं जिससे आज का साहित्य जगत अवश्य ही अपरिचित होगा। उन्होंने लिखा है: "नाथूराम प्रेमी किस कद-बुत के प्रकाशक थे, इसके लिए चंद उदाहरण ही काफी होंगे। वे प्रेमचन्द्र और जैनेन्द्र के ही प्रकाशक नहीं थे। हजारीप्रसाद द्विवेदी की 'बाणभट्ट की आत्मकथा', 'कबीर' और 'हिन्दी साहित्य की भूमिका' के प्रकाशक भी वही थे।"

अंत में

रिटायर होने के बाद से, हर रोज़ इतना कुछ पढ़ता हूँ, कि सब के बारे में लिखना सम्भव नहीं है, लेकिन जो पढ़ा उसमें क्या याद रखने लायक लगा, यह लिखना शायद थोड़ा सा आसान है। मेरे लिए ब्लॉग मेरी डायरी है, इस आलेख को लिखने की चेष्ठा का मेरा यही अर्थ है।

इस आलेख में जिन कहानियों और आलेखों के बारे में मैंने लिखा है, अगर आप कहें कि उसमें से चुन कर यह बताईये कि सबसे अधिक अच्छा क्या लगा, तो मेरा चुनाव होगा, अकार पत्रिका के 73 अंक में ही "मेरी रचनात्मकता: मेरे द्वंद" शीर्षक से विभिन्न लेखकों के वक्तव्य - इस बार सबसे अधिक दिलचस्प मुझे वही लगे।

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इस वर्ष के लोकप्रिय आलेख