अब तक की कहानी: प्रतिमा की खोज में त्री, आभा और ओरी डमरू द्वीप पहुँचे जहाँ पर शक्तिवान प्रतिमा एक गुफा में छिपी थी। द्वीप पर उतरना कठिन था क्योंकि बहुत से घड़ियाल थे। तब आभा ने अपनी शक्ति से उन्हें वहाँ से हटाया और फिर, त्री और ओरी उस द्वीप पर उतरे। वहाँ उन्हें एक गुफा में सरस्वती मां की एक शक्तिवान मूर्ति मिली, उसे ले कर वह मोटरबोट में लौटे। आगे पढ़िये ...
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अध्याय 30
मजूली, असम, 8 - 9 मार्च 2026
काज़ीरंगा से लौटते समय त्री ने ओरी से पूछा, “याकूज़ा का क्या काम होता है?”
“उनका सबसे बड़ा काम है लोगों को डराना और धमकाना, ताकि लोग चुपचाप अपना ऋण चुका दें, या प्रतिद्वंदी हमारे क्षेत्र में धँधा नहीं करें या दुश्मन हम पर हमला नहीं करें। इसलिए याकूज़ा का शरीर और भाव ऐसे होने चाहिये कि उन्हें देख कर ही लोग डर जायें। अगर डराने से काम नहीं चलता तो याकूज़ा को मार-पिटाई भी करनी पड़ती है, विशेषकर प्रतिद्वंदियों के गुँडों की। जब बॉस कहें तो याकूज़ा किसी को जान से भी मार सकते हैं।"
“लोगों का खून कर देते हैं? किसका?”
“किसी को भी मार सकते हैं, हमारा काम प्रश्न पूछना नहीं है, आदेश का पालन करना है। याकूज़ा, वह सही-गलत की बहस में नहीं पड़ते, जिसे मारने का आदेश मिले और जिस तरह से मारने का आदेश मिले, उसे वैसे ही मार देते हैं।"
“जिस तरह से मारने का आदेश मिले, इसका क्या मतलब है?”
“अगर किसी को चेतावनी देनी हो कि वह लोग हमसे डर कर रहें, तो हम खुले आम, लोगों के बीच में भी किसी का सिर काट सकते हैं। अगर किसी को केवल रास्ते से हटाना है तो उसे चुपचाप, दूर से गोली भी मार सकते हैं। कभी-कभी किसी को ऐसे मारते हैं कि वह एक्सीडैंट लगे। यह बॉस के आदेश पर निर्भर करता है।"
"औरतों और बच्चों को भी?”
ओरी ने सिर हिला कर मना किया, बोला, “मैं छोटे बच्चों को नहीं मारता और औरतों को मारने से पहले कारण पूछता हूँ, अगर ठीक नहीं लगे तो मना कर देता हूँ। वैसे मैंने अभी तक किसी औरत को नहीं मारा।"
“तुम इस रास्ते पर कैसे आये?”
“यामागुचि दादा जी, अक्को में हमारे पड़ोसी थे। वहाँ उनका परिवार जूएखाने चलाता था और उन्होंने बहुत पैसा बनाया था। मेरे पिता उनके लिए काम करते थे। जब वह गुज़र गये तो यामागुचि सान ने मेरी माँ को घर चलाने का पैसा दिया और मुझे स्कूल भेजा। जब मैं थोड़ा सा बड़ा हुआ तो उन्होंने मुझे अपनी छत्रछाया में ले लिया। उन्होंने मेरी शक्ति को पहचाना और मुझे याकूज़ा बनने की शिक्षा और प्रशिक्षण दिलवाया, उसके बाद मैं उनका याकूज़ा बन गया।"
“और अब, इस काम के बाद?”, त्री ने पूछा।
वह मुस्कराया, बोला, "यह मूर्ति उन्हें दे कर मैं उनका ऋृण चुका दूँगा। जैसे तुम्हारे गुरु जी कहते हैं, शायद शक्ति का उपयोग दुनिया के भले के लिए करना बेहतर है। अगर हो सकेगा तो मैं कुछ समय भारत में तुम लोगों के साथ बिताना चाहता हूँ। यह मूर्ति उन्हें दे कर, मैं तुम्हारे यहाँ लौट कर आऊँगा।"
उन्होंने मोटरबोट में ही खाना खाया, तब ओरी आभा के पास बैठा था, उससे बातें कर रहा था। गार्गी ने त्री से धीरे से कहा, “दादा, मेरे विचार में इन दोनों का मामला फिट हो गया है।"
“क्या आभा को भी वह अच्छा लगता है?” उसने पूछा तो गार्गी ने सिर हिला कर हामी भरी।
बच्चों को मजूली उतार कर, त्री और आभा, ओरी को छोड़ने नारायणपुर गये। बच्चों से विदा लेते हुए ताकानोरी ने कहा, “एक दिन मैं तुम्हारे अनाथाश्रम में तुम लोगों के साथ रहने आऊँगा। तब मैं तुम्हें जूदो, आइकीदो, जिजुत्सु, वगैरा जापानी मार्शियल आर्टस् और लड़ाई करना सिखाऊँगा। अगर तुम सचमुच के योद्धा बनना चाहते हो तो केवल शक्ति से काम नहीं चलेगा, योद्धा को लड़ना भी आना चाहिये।
नारायणपुर में घर पहुँच कर, ओरी ने जापान में अपने बॉस को वीडियो-कॉल किया और उसे सरस्वती माँ की मूर्ति दिखायी, बताया कि उसने मूर्ति को जाँचा है और स्वयं उस मूर्ति की प्रबल शक्ति को महसूस किया है। बोला, “इस प्रतिमा के पास रहो तो मन में शाँति की अनुभूति होती है।"
जापान लौटने के लिए जब ओरी ने अपना सामान पैक कर लिया, तब तीनों ने साथ बैठ कर रात का खाना खाया। ओरी ने सबके लिए रामेन का सूप बनवाया, बोला, “अभी मेरे पास इन जापानी नूडल्स के बहुत सारे पैकेट बचे हुए हैं, मैं उन्हें तुम्हारे लिए छोड जाऊँगा।"
आभा बोली, “हम इसमें सब्जियाँ, मिर्ची, मसाला डाल कर इस रामेन को अपने तरीके से बनायेंगे और जब तुम लौट कर आओगे तब तुम्हें हिन्दुस्तानी रामेन खिलायेंगे।"
अगले दिन सुबह ताकानोरी को कलकत्ता के लिए रवाना होना है, जहाँ से उसे जापान के लिए हवाई जहाज़ मिलेगा।
*
ओरी से विदा ले कर, त्री और आभा को वृद्धाश्रम में लौटे हुए करीब आधा घंटा हुआ था और वे दोनों कैंटीन में बैठ कर जगदीश बाबू के साथ चाय पी रहे थे जब अचानक मन्दिर की घंटियाँ बजने लगीं। घंटियों की आवाज़ कैंटीन में भी स्पष्ट आ रही थी।
जगदीश बाबू घबरा कर उठ खड़े हुए, बोले, “ऐसी घंटियाँ की ध्वनि तो मैंने यहाँ पहले कभी नहीं सुनी थी, शायद कोई तूफान आ रहा है?”
त्री बोला, “जगदीश बाबू, मेरे विचार में यह घंटियाँ गुरु जी बजा रहे हैं और कह रहे हैं कि उनकी समाधी समाप्त हो गयी है।"
जगदीश बाबू को विश्वास नहीं हुआ, बोले, “इतने दिनों तक धरती में दबे रहने के बाद भी क्या जामुन बाबा जीवित हैं?”
वह तीनों उठ कर बाहर आये तो देखा कि वृद्धाश्रम के अन्य बहुत से लोग उनकी तरह वहाँ खड़े हो कर मंदिर की ओर देख रहे थे। वह तीनों मंदिर की ओर आगे बढ़े तो उनके पीछे-पीछे अन्य लोगों की भीड़ भी आ गयी।
त्री मंदिर वाली पहाड़ी की सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर गया। उसके पीछे-पीछे बाकी के सब लोग आ रहे थे। उसने हाथ उठा कर लोगों से रुकने का इशारा किया, फिर बोला, “गुरु जी जिस तपस्या के लिए समाधी में लीन हुए थे, उनकी वह तपस्या पूरी हुई है। यह घंटियाँ उनके प्रभाव से बज रही हैं, वह कह रहे हैं कि उनकी समाधी का समय समाप्त हो गया है, वह हमारे जगत में लौट रहे हैं। जगदीश बाबू, तुरंत उन मजदूरों को बुलाईये, जिन्होंने गुरु जी की समाधी बनायी थी।" उसके यह कहने के बाद मंदिर की घंटियाँ बजनी अपने आप थम गयीं।
जगदीश बाबू ने मजदूर बुलाने के लिए लोग भेजे, फिर बोले, “जब ताकानोरी ने इस समाधी को खुलवाने की कोशिश की थी तो वह इसे नहीं खोद पाये थे, तो अब यह मजदूर क्या इसे खोल पायेंगे?”
त्री हँसा, “जब गुरु जी कह रहे हैं कि उनकी समाधी पूर्ण हो गयी तो अब इसे खोदनें में कोई कठिनाई नहीं आयेगी।"
इस बार मजदूरों को समाधी का पत्थर हटाने में ज़रा सी भी दिक्कत नहीं हुई। समाधी का बक्सा करीब दस फुट मिट्टी के नीचे दबा था, वहाँ से उस मिट्टी को हटाने में करीब दो घंटे लगे। जब वह बक्से तक पहुँचे तो मैदान लोगों से भर चुका था और यह सुन कर कि बाबा की समाधी का बक्सा दिखने लगा है, उन लोगों ने "जामुन बाबा" का नाम जपना शुरु कर दिया।
आसपास की सारी मिट्टी हटाने और बक्से को बाहर निकालने में करीब आधा घंटा और लगा। उसके आगे-पीछे रस्सियाँ लपेट कर मजदूरों ने डिब्बे को ऊपर उठाया तो उत्तेजित हो कर सब लोग चिल्लाने लगे।
त्री ने आगे बढ़ कर बक्से के पाट खोले, भीतर उसके गुरु जी पद्मासन में आँखें बंद किये बैठे थे, उनकी गोद में उनकी भिक्षा का कटोरा था और उसमें तारा की मूर्ति थी। सारे मैदान में सन्नाटा छा गया। लोग हाथ जोड़ कर उस दृश्य को देख रहे थे। त्री ने झुक कर अपने गुरु जी के चरण छूए लेकिन गुरु जी बहुत देर तक वैसे ही बिना हिले-डुले बैठे रहे।
फिर उनकी पलकें थरथराईं और उन्होंने धीरे-धीरे आँखें खोलीं, सारे मैदान में "जय जामुन बाबा" की ध्वनि गूँज उठी, लोग तालियाँ बजाने लगे, कुछ लोग भावविभूत हो कर रोने लगे। गुरु जी कुछ देर तक चुपचाप सबको देखते रहे फिर उन्होंने बक्से के बाहर टाँगें निकाली और बाहर निकल आये, त्री ने उन्हें खड़े होने के लिए सहारा दिया।
आभा और जगदीश बाबू, दोनों ने झुक कर उनके पैर छूए। वह पहले भी दुबले-पतले थे, लेकिन अब वह इतने कमज़ोर हो गये थे कि उनके शरीर की सभी हड्डियाँ दिख रही थीं, लगता था कि हड्डियों और चमड़ी के बीच में माँसपेशियाँ बिल्कल ही नहीं हों।
गुरु जी चुपचाप बिना किसी सहारे के मंदिर की ओर बढ़े, हाथ उठा कर उन्होंने बाहर वाला घंटा बजाया, फिर मंदिर की ओर नमन किया और हाथ ऊपर उठा कर मैदान में खड़े लोगों का अभिवादन किया। फिर वह त्री की ओर मुड़े, बोले, “बेटा, मैं थक गया हूँ, मुझे घर ले चलो।"
एक हाथ त्री के कँधे पर और दूसरा आभा के कंधे पर रख कर, वह धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरे और लोगों की भीड़ के बीच में अपने घर की ओर चले। जिस जगह वह पैर रख रहे थे, बहुत से लोग उस जगह से मिट्टी ले कर उसे अपने माथे पर लगा रहे थे।
घर के प्रांगण में बच्चे उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। रंगनाथ, गार्गी, वसंत, माधव और तृप्ति ने उन्हें प्रणाम किया और उन्होंने सबके सिर पर प्यार से हाथ रख कर सहलाया। जब तृप्ति की बारी आयी तो वह धीरे से बोले, “तुमने कितनी ज़ोर से घंटियाँ बजायीं, ज़मीन के नीचे से भी मुझे उनकी गूँज सुनाई दे रही थी।" तृप्ति खुश हो कर मुस्करायी।
गुरु जी ने कुछ फलाहार किया और थोड़ा सा दूध पिया, फिर उन्होंने जगदीश बाबू को पास बुलाया, बोले, “अब यहाँ पर मेरा काम समाप्त हो गया है। प्रभु ने मुझे अपना बाकी का जीवन, प्रार्थना में बिताने की आज्ञा दी है। कुछ दिनों में मैं यहाँ से चला जाऊँगा। अब यह वृद्धाश्रम आप को और यहाँ के रहने वाले लोगों को ही चलाना होगा।”
जगदीश बाबू रोने लगे, बोले, “बाबा, आप ने इस आश्रम को जन्म दिया है, आप की कृपा से मेरे जैसे लोगों को, जिनके परिवार नहीं हैं या जिन्हें उनके बच्चे अकेला छोड कर चले गये हैं, हमें गरिमा से जीने का मौका दिया है। आप के बिना हम इसकी ज़िम्मेदारी कैसे उठायेंगे?”
गुरुजी मुस्कराये, बोले, “जब मैंने समाधी ली थी, तब नहीं जानता था कि इस समाधी से लौटूँगा या नहीं। तब आप ने मेरा निर्णय स्वीकार किया था और वृद्धाश्रम को चलाने की ज़िम्मेदारी ली थी, तो अब क्या हो गया? हम वृद्ध अवश्य हैं, लेकिन निस्सहाय नहीं हैं, और दुनिया का कोई काम ऐसा नहीं है जिसे हम लोग नहीं कर सकते। क्या आप इस बात को भूल गये हैं? आप के साथ आप का सहकारी संघ है, आप के साथी हैं, मुझे पूरा विश्वास है कि आप के नेतृत्व में यह वृद्धाश्रम और भी समृद्ध तथा विकसित होगा।"
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उपन्यास का अगला और अंतिम अध्याय सोमवार 14 सितम्बर को पढ़ सकते हैं
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"जो न कह सके" के आलेख पढ़ने एवं टिप्पणी के लिए डॉ. सुनील दीपक की ओर से आप का हार्दिक धन्यवाद.